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  1. हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे - श्री कृपालु जी, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (92)

    हे वृषभानुनंदिनी राधे! थोड़ा इस अधम की ओर भी अपनी कृपा-कटाक्ष युक्त दृष्टि डालिए। यद्यपि मैं यह बात पूर्ण रूप से जानता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा कोई भी हितैषी नहीं। तुम ही एकमात्र मुझ अगति की गति हो तथापि महापुरुषों के बताये हुए आदेशों का परिपालन नहीं करता वरन् सांसारिक विषयों का दास ही बना रहता हूँ।