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  1. सेज सुसंपति जुगल रति दंपति - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (45)

    श्रीवृन्दावन के दिव्य निकुञ्ज-भवन में सुन्दर शय्या और समस्त मनोहर रस-सामग्रियों से सुशोभित श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अपनी अनन्य गति, मति और प्रेम को एक-दूसरे में समर्पित कर परस्पर गहन प्रेम में लीन हैं। श्रीवृन्दावन रूपी उनके निज धाम में युगल दंपति के नित्य-बिहार के अलौकिक सुख का निरंतर दर्शन प्राप्त होता है।

  2. कीरति की कामना चढ़ाय चित्त - श्री कान्त किशोर, श्री कान्त किशोर जी की वाणी (11)

    जिन्होंने अपने चित्त में यश की कामना और धन की आशा रखकर श्रीराधा-कृष्ण के कुंज-विलास की काव्य-रचनाएँ गाई है अथवा घर-बार का त्याग करने पर भी देह की सुख-सुविधा और श्रृंगार आदि की इच्छा संजोई है, उनके मन में सांसारिक आशाओं और वासनाओं का नगाड़ा ही बज रहा है।

  3. सा वै सुमाता च पिता - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.45)

    जो श्रीवृन्दावन में वास करने के लिए आदेश दे, वही मेरी सुमाता है तथा वही मेरा पिता, वही बन्धु, वही सखा और वही मेरा वन्दनीय देवता है।

  4. किया था गोपियों ने यहीं - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (23)

    गोपियों ने मन को चुराने वाले चंचल श्रीकृष्ण को पाने की तीव्र लालसा में इसी श्रीधाम वृन्दावन में श्री कात्यायनी देवी का व्रत किया था।

  5. प्रनत-पाल-विरदावली राखी आनि जहान - ब्रज के दोहे

    हे कृपानिधान! आपने संपूर्ण संसार में अपने शरणागत-पालक होने के यश की मर्यादा को सदा बनाए रखा है। फिर अब मेरी बारी आने पर आप मुझ पर कृपा करने में क्यों विलंब कर रहे हैं, दया करके मुझ पर भी अपनी करुणा दृष्टि कीजिए।

  6. मंजन चीर सु हार हिये - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (29)

    श्री वृषभानु-नंदिनी श्री राधा स्नान करके सुंदर वस्त्र, हृदय पर मनोहर हार, मस्तक पर तिलक-बिंदी, नेत्रों में कज्जल और नासिका में मोती नथ धारण किए हुए हैं।

  7. चिन्ता तो हरि नामकी और न चितवै दास - श्री कबीरदास

    भक्त को केवल श्रीहरि के नाम का ही निरंतर चिंतन करना चाहिए और उसके अतिरिक्त किसी अन्य विषय का विचार नहीं करना चाहिए। श्रीहरिनाम के बिना जिन विषयों का मनुष्य चिन्तन करता है, वे सब अन्ततः उसे जन्म-मृत्यु के बन्धन में फँसाने वाले काल के फन्दे के समान हैं।

  8. श्री वल्लभ वल्लभ रटत हो - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (08)

    मैं निरंतर 'श्री वल्लभ-श्री वल्लभ' नाम का रटन करता हूँ, क्योंकि श्री वल्लभ ही मेरे जीवन और प्राण हैं। मुझे अपने माता-पिता की सौगंध है, मैं श्री वल्लभ को कभी भी नहीं भूलूँगा और सर्वदा उनका ही स्मरण रखूँगा।

  9. तू सुनि कान दैरी मुरली - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (121)

    हे राधे! तुम कान लगाकर मुरली की धुन सुनो, कुंज-भवन में श्रीश्यामसुंदर तुम्हारे ही गुणों का गान कर रहे हैं। जो पवन तुम्हारे श्रीअंग का स्पर्श करके आती है, वे उसके सम्मुख होकर उसे प्रेमपूर्वक अपने हृदय से लगा लेते हैं।

  10. कहा बुद्धि कहा कहि सकूँ - श्री चरणदास

    श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य रास-केलि की मनोहर प्रेममयी क्रीड़ा का वर्णन करने में मेरी बुद्धि कहाँ समर्थ है? वहाँ ऐसी अद्भुत और अनुपम लीलाएँ हो रही हैं कि उनका वर्णन करने में अपनी असमर्थता का अनुभव कर मुझे लज्जा आती है।

  11. निरतत रसिक सदा उजियारी थेई - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण सदा परम उज्ज्वल कांति से प्रकाशित होकर नृत्य कर रहे हैं। वे 'थेई-थेई' शब्द का मधुर उच्चारण करते हुए समस्त ब्रज-युवतियों के मन का हरण कर लेते हैं तथा करोड़ों कामदेवों के मद का नाश करने वाले हैं।

  12. यह उत्कंठा की लता चली - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (15)

    मेरे हृदय में उत्पन्न हुई तीव्र उत्कंठा रूपी लता बड़ी शीघ्रता से मुरझाने लगी है। यदि आप दोनों घन-दामिनी स्वरूप श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अति शीघ्र पधारकर इस पर अपनी कृपा-जल की वर्षा नहीं करेंगे, तो यह लता विरह की अग्नि में सूखकर नष्ट हो जाएगी।

  13. गुन रूपकी अवधि राधिका - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (128)

    गुण और सौंदर्य की पराकाष्ठा श्री राधिकाजू ने रसिक-शिरोमणि श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण का तन, मन, धन, यौवन, आभूषण और प्राण—सब कुछ उनकी प्राणप्रिया श्रीराधाजी के लिए ही समर्पित है।

  14. कबकी टेरत दीन है सुनत न नाथ पुकार - श्री दयाबाई

    हे नाथ! यह दीन जीव न जाने कब से आपको पुकार रहा है, किंतु आप मेरी पुकार सुन ही नहीं रहे हैं। क्या आपके कान ऊँचा सुनने लगे हैं, अथवा आपने दीनों पर दया करने का अपना सहज स्वभाव (विरद) ही भुला दिया है?

  15. धन-धन वृन्दावन के साँप प्यारे - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (81)

    वृंदावन धाम के वे प्यारे सर्प अत्यंत धन्य हैं, जो वास्तव में काले भुजंग होकर भी सीधे ठाकुर जी के मंदिर में निवास करते हैं और वहाँ बोलते हैं।

  16. राधे आनन निरखिकै चकित रहे - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (32)

    श्री राधा के श्रीमुख को निहारकर स्वयं नंदनंदन श्री कृष्ण आश्चर्य चकित रह जाते हैं। प्रेम की रीति बड़ी विचित्र है कि त्रिभुवन-मोहन, ब्रजचन्द्र श्री कृष्ण भी चकोर की भाँति श्री राधा के मुख-चंद्र को टकटकी लगाए निहार रहे हैं।

  17. अब तो राधा चरन मन - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (146)

    अब मेरा मन पूर्णतः श्री राधा जी के चरणों में समर्पित हो गया है। कुँवरि किशोरी, अतिशय प्रिय प्रिया जी ने कृपा करके मुझे अपना बना लिया है।

  18. सुजस जाहु व्यौहार लागि परमारथ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (8)

    भले ही संसार के लोक-व्यवहार में मेरा यश और सुकीर्ति नष्ट हो जाए तथा परमार्थ के क्षेत्र में भी मेरा नाम पूर्ण रूप से मिट जाए, फिर भी मैं श्री धाम वृन्दावन को छोड़कर किसी भी अन्य स्थान पर कभी नहीं जाऊँगा।

  19. प्यारी तू अद्भुत छबि की - श्री रूप सखी जी,श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (181)

    हे प्यारी जी (श्रीराधाजू)! आप अद्भुत रूप-सौंदर्य की राशि हैं। आपके अत्यंत मनोहर मुखारविंद की दिव्य आभा पर शरद पूर्णिमा के करोड़ों चंद्रमा भी न्योछावर हैं।