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  1. तुमसे हम को एक है - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

    हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही एकमात्र शरण व सर्वस्व हैं, किंतु आपके लिए तो मेरे जैसे अनगिनत जीव व अनुरागी हैं। अतः हे प्राणप्रियतम! आप जैसा भी उचित समझें वैसा व्यवहार करें, बस ऐसी कृपा करें कि हमारे इस निष्काम प्रेम की प्रतिज्ञा का सदा निर्वाह होता रहे।

  2. यह प्रेम कथा कहिये किहि - श्री ठाकुर जी

    हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।

  3. जोग जज्ञ तप नाम बिनु - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    श्री भगवन्नाम के बिना योग, यज्ञ, तपस्या आदि समस्त साधन निष्फल हो जाते हैं। श्री गुरु छौना जी कहते हैं कि जैसे सेमर के वृक्ष का यत्नपूर्वक पालन करने पर, फल पकने पर भी भीतर से केवल व्यर्थ रुई (कपास) ही निकलती है, कोई खाने योग्य फल नहीं मिलता, वैसे ही नाम-हीन साधन भी निष्फल सिद्ध होते हैं।

  4. हिंडोरौ ब्रज के आँगन माँच्यौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं।

  5. अहो कुँवरि तुब रूप यह - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)

    हे किशोरी जी (श्रीराधा)! आपका यह अनुपम सौन्दर्य किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करता। आपकी स्मृति मुझे अपनी सुध-बुध भुला देती है और मेरे हृदय के मर्मस्थल को प्रेम-बाणों से निरन्तर बींधती रहती है।

  6. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  7. टेरत राधा-नाम टरे न मुख - श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (36)

    श्री राधा के वियोग में श्री कृष्ण 'राधा' नाम की निरंतर पुकार कर रहे हैं, एक क्षण को भी मुख से नहीं भुला रहे। समस्त विश्राम को त्याग कर अब तो केवल यही लालसा है कि कब प्रिया जी की उस बाँकी चितवन की रसमय झाँकी प्राप्त होगी।

  8. धन हित सटकौ अनत कौ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (16)

    यदि धन-संपदा की तृष्णा के वशीभूत होकर मैं श्रीधाम वृन्दावन को पीठ दिखाकर किसी अन्य स्थल की ओर पलायन करूँ, तो मैं अपने ही नेत्र फोड़ लेने योग्य हूँ।।

  9. ललिता ललित प्रबीन बीन लै - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (31)

    अति चतुर और सुंदर सखी श्री ललिता जी अपने हाथों में वीणा लेकर खड़ी होकर मधुर सुरों में गा रही हैं। शय्या पर लेटे हुए श्री श्यामा-श्याम इस मधुर तान को सुन रहे हैं, जिससे उनके कानों में इस संगीत को सुनने की रुचि और अधिक बढ़ रही है।

  10. श्री विपुल बिहारनिदास को मैं पायो - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (17)

    श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उन्हें श्री विट्ठलविपुल देव जी तथा श्री बिहारिन देव जी का पूर्ण सत्संग प्राप्त हुआ है। ऐसे अनन्य रसिकों के प्रभाव से श्री प्रिया-प्रियतम के प्रति जो अनन्य अनुराग प्रकट हुआ है, उससे उनका चित्त नित्य प्रफुल्लित और आनंदित रहता है।

  11. धन-धन बृन्दाविपिन बसैं हलवाई - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (95)

    श्री वृन्दावन धाम में निवास करने वाले हलवाइ अत्यंत धन्य और सौभाग्यशाली है। वे परम प्रेम से अत्यंत सुंदर जलेबी, खुरमा, खाजा और मलाई इत्यादि मिष्ठान तैयार करते हैं।

  12. आरती राधिका-लाल पर वारौं सहज - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (20)

    मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।

  13. झूठ कुटुम संग्रहे तजे सत - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

    जीव मिथ्या सांसारिक संबंधों एवं वस्तुओं के संग्रह में निरंतर लगा रहता है, परंतु अपने एकमात्र सच्चे हितैषी श्री श्यामसुंदर के अकारण-निश्चल प्रेम का परित्याग किए रहता है। वह परमार्थ से विमुख होकर उसकी ओर पीठ कर लेता है तथा अपनी दृष्टि और समस्त पुरुषार्थ केवल नश्वर संसार में स्वार्थयुक्त लगाए रखता है।

  14. रूप रस मांते महा प्रेम - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)

    जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।

  15. वृन्दावने नन्दित कृष्णचन्द्र - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.14)

    जिस श्रीवृन्दावन में श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दपूर्वक नित्य विहार करते हैं और जहाँ निरालस काम-विलास-लीलाओं का अखण्ड समूह विद्यमान है, वहाँ मेरा मन श्रीराधा महारानी के चरण-कमलों पर गुंजार करने वाली भ्रमरी के समान सदा अनुरक्त रहे।

  16. श्रीहरिवंश चरण बिनु बल गहौं - श्री हित चतुर्भुजदास जी

    श्री हित हरिवंश महाप्रभु के चरणों के अतिरिक्त मैं और किसका बल (आश्रय) ग्रहण करूँ? जिनके लिए लाड़ली-लाल (श्री राधा-कृष्ण) का दिव्य केलि-मिलाप और सुखदायक श्री वृन्दावन ही एकमात्र वास्तविक धन है।

  17. दीनबंधु तुम दीन हौं यह - ब्रज के दोहे

    हे भगवन्! आप दीनबंधु हैं और मैं दीन हूँ। आपका और मेरा यह बहुत सुंदर बना-बनाया नाता है, अतः मेरे इस संबंध पर आप अवश्य ही विचार कीजिए। हे कृपालु महाप्रभु! मेरी इस विशेष विनती को सुनकर मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।