नेति नेति कहि ताहि वेदहू - श्री चरणदास, भक्ति सागर
वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं।
ब्रज-रसिक संतों द्वारा रचित कवित्त, भक्ति की रसपरक साधना का एक अनमोल स्रोत हैं। इन पदों के श्रवण और गायन से साधक के हृदय में श्रीराधा-कृष्ण के प्रति गहन अनुराग स्वतः उत्पन्न होता है। यह संकलन विशेष रूप से उन साधकों के लिए प्रस्तुत है, जो रस-मार्ग की भावना को हृदयंगम करना चाहते हैं। इसमें चयनित कवित्तों को उनके भावपूर्ण अर्थ सहित समर्पित भाव से संकलित किया गया है।
353 कवित्त उपलब्ध हैं
वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं।
हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।
आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है – ठाकुर जी के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), उनके मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है।
श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो।
हमारे मन के लिए प्यारे ब्रजवल्लभ के दर्शन ही महान सुखस्वरूप और सदा शांति के धाम हैं।
जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।
श्री वृन्दावन के रसमय कुंज-कुंजों में नित्य प्रेम-विलास करने वाले, आनंद के मूल, श्री गोपाल जी की मूरति परम मनोहर है।
हे मनुष्य! तुम्हें यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, इसलिए अपने परम कल्याण का प्रयत्न करो। संतों की संगति करके भक्ति-रस रूपी अमृत का पान करो।
श्री राधारानी के चरण कमल से भी अधिक सुकोमल हैं, गहरे गुलाब के फूल की आभा से भी अधिक रक्तिम हैं। नकी लालिमा आम्र-पत्रों की कोमल आभा को भी फीका कर देती है।
नन्दगाँव, गोकुल और श्री गोवर्धन की ऐसी अगाध महिमा है कि इसका कहाँ तक वर्णन करूँ? वहाँ की गोपियों, गोपों, ग्वालबालों और गायों की शोभा का बखान करना शब्दों की सीमा से परे है।
यमुना जी के तट पर श्री गिरिधर लाल, श्री राधिका के साथ सुंदर रास मण्डल में नृत्य कर रहे हैं।
गिरिराज गोवर्धन वह दुर्ग है जिसने इन्द्र के अभिमान का मर्दन किया था। श्री यमुना जी का जल अमृत के समान प्रवाहित होता है।
हे सुकुमारी (श्री राधा)! आप कुंज-बिहारी श्री कृष्ण के प्राणों की प्यारी हैं। मेरी अल्पता को जानकर अपनी कृपा-दृष्टि मुझ पर डालिये।
योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थाटन, व्रत और दान—ये सभी साधन मिलकर भी 'संत-सेवा' की समानता नहीं कर सकते।
वृन्दावन के रूप और गुणों के वशीभूत होकर हंस, मोर और कोयल सदैव प्रेम के रंग में सराबोर रहते हैं।
बलिहारी है आज प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) प्रेम के हिंडोले (झूले) में झूल रहे हैं। उन्होंने नीले और पीले वस्त्र धारण किए हैं, जिनकी आभा चारों ओर छलक रही है।
देश-देशान्तर के अनेक व्यक्ति यहाँ खिंचे चले आते हैं, जिनके हृदय में प्रेम की प्रज्वलित ज्वाला धधक रही है।
श्री गोपाल बरसाने में फाग (होली) खेलने के लिए पधारे हैं। चारों ओर लोग फागुन के गीत गा रहे हैं, हाथ से ताल दे रहे हैं, और सबका हृदय आनंद से झूम रहा है।
ब्रह्मा और इन्द्र कहते हैं—हमें ब्रह्मलोक अथवा स्वर्गलोक के सम्राट की पदवी नहीं चाहिए। यदि ब्रज में एक वृक्ष बनने का भी सौभाग्य मिल जाए, तो हम सदा वहीं बने रहना चाहेंगे।
हे श्री राधारानी! श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए वह मंगलमय क्षण कब आएगा, जब मेरे नेत्र आपके प्रेम में अविरल अश्रुधारा बहाएँगे और मेरा मुख प्रेमपूर्वक आपके नाम का उच्चारण करेगा? मेरे हृदय में ऐसी निष्कपट और अखण्ड प्रीति-दशा की प्राप्ति कब होगी?