ब्रज के कवित्त

ब्रज-रसिक संतों द्वारा रचित कवित्त, भक्ति की रसपरक साधना का एक अनमोल स्रोत हैं। इन पदों के श्रवण और गायन से साधक के हृदय में श्रीराधा-कृष्ण के प्रति गहन अनुराग स्वतः उत्पन्न होता है। यह संकलन विशेष रूप से उन साधकों के लिए प्रस्तुत है, जो रस-मार्ग की भावना को हृदयंगम करना चाहते हैं। इसमें चयनित कवित्तों को उनके भावपूर्ण अर्थ सहित समर्पित भाव से संकलित किया गया है।

365 कवित्त उपलब्ध हैं

  1. राधिका कौ नाम सुखधाम विसराम - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (20)

    हे मेरे बावले मन! यदि तू परम सुख और विश्राम की प्राप्ति चाहता है, तो व्यर्थ के सांसारिक विषयों और प्रपंचों को त्यागकर श्रीराधिका के नाम का ही निरंतर स्मरण क्यों नहीं करता?

  2. सुंदर-बदन राधे सोभा को सदन - श्री मतिराम

    हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है।

  3. आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी

    मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।

  4. रस ही सों तरु ठाढ़े - ब्रज के कवित्त

    इस संसार में वृक्ष केवल रस के प्रभाव से ही सीधे खड़े हैं, उनके पत्ते रस के कारण ही हरे-भरे हैं, वे फूलों से लदे हुए हैं और इस रस ने ही संपूर्ण प्रकृति को जीवन प्रदान किया है।

  5. यहीं तो थी कभी ऋषि - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (20)

    यही वह स्थान है जो यमुना जी के तट के बिल्कुल निकट है और कभी परम तपस्वी सौभरि ऋषि की पवित्र तपोभूमि हुआ करता था।

  6. प्यारी की सहेली निज जानिक - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (55)

    मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। [1]

  7. चरन हैं नीके हित ही - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

    श्री राधारानी के चरण अत्यंत सुंदर, हितकारी और भक्तों के मन को प्रिय लगने वाले हैं, जो सभी संकटों का हरण करने वाले तथा ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाले हैं।

  8. कौन दिन ऊँचे सुर राधिका - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (57)

    वह दिन कब आएगा जब मैं श्री वृन्दावन की लताओं के मध्य ऊँचे स्वर में 'श्री राधिका! श्री राधिका!' पुकारूँगी और श्री धाम के उस परम-रस में मेरी गति और बुद्धि पंगु (स्तब्ध) हो जाएगी?

  9. रूप रस मांते महा प्रेम - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)

    जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।

  10. मेरी कुल पूजि तुहीं मानी - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (41)

    हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।

  11. चन्द्रिका की चटक मुकुट की - श्री रसिक गोविंद

    आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है – ठाकुर जी के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), उनके मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है।

  12. परयौ हो जगत भव भरयौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)

    जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।