ब्रज के कवित्त

ब्रज-रसिक संतों द्वारा रचित कवित्त, भक्ति की रसपरक साधना का एक अनमोल स्रोत हैं। इन पदों के श्रवण और गायन से साधक के हृदय में श्रीराधा-कृष्ण के प्रति गहन अनुराग स्वतः उत्पन्न होता है। यह संकलन विशेष रूप से उन साधकों के लिए प्रस्तुत है, जो रस-मार्ग की भावना को हृदयंगम करना चाहते हैं। इसमें चयनित कवित्तों को उनके भावपूर्ण अर्थ सहित समर्पित भाव से संकलित किया गया है।

357 कवित्त उपलब्ध हैं

  1. कौन दिन ऊँचे सुर राधिका - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (57)

    वह दिन कब आएगा जब मैं श्री वृन्दावन की लताओं के मध्य ऊँचे स्वर में 'श्री राधिका! श्री राधिका!' पुकारूँगी और श्री धाम के उस परम-रस में मेरी गति और बुद्धि पंगु (स्तब्ध) हो जाएगी?

  2. रूप रस मांते महा प्रेम - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)

    जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।

  3. मेरी कुल पूजि तुहीं मानी - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (41)

    हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।

  4. चन्द्रिका की चटक मुकुट की - श्री रसिक गोविंद

    आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है – ठाकुर जी के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), उनके मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है।

  5. परयौ हो जगत भव भरयौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)

    जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।

  6. कोमल कमल हू सों गहरे गुलाबन सों - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (06)

    श्री राधारानी के चरण कमल से भी अधिक सुकोमल हैं, गहरे गुलाब के फूल की आभा से भी अधिक रक्तिम हैं। नकी लालिमा आम्र-पत्रों की कोमल आभा को भी फीका कर देती है।

  7. नन्दगाँव गोकुल गोवर्धन की काह कहौं - श्री मधुरेश जी

    नन्दगाँव, गोकुल और श्री गोवर्धन की ऐसी अगाध महिमा है कि इसका कहाँ तक वर्णन करूँ? वहाँ की गोपियों, गोपों, ग्वालबालों और गायों की शोभा का बखान करना शब्दों की सीमा से परे है।

  8. इन्द्र-मद-मर्दन दुर्ग - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (5)

    गिरिराज गोवर्धन वह दुर्ग है जिसने इन्द्र के अभिमान का मर्दन किया था। श्री यमुना जी का जल अमृत के समान प्रवाहित होता है।

  9. एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की - श्री प्रेम दास जी की वाणी (43)

    हे सुकुमारी (श्री राधा)! आप कुंज-बिहारी श्री कृष्ण के प्राणों की प्यारी हैं। मेरी अल्पता को जानकर अपनी कृपा-दृष्टि मुझ पर डालिये।

  10. प्रेम के हिंडोरे बलि - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (109)

    बलिहारी है आज प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) प्रेम के हिंडोले (झूले) में झूल रहे हैं। उन्होंने नीले और पीले वस्त्र धारण किए हैं, जिनकी आभा चारों ओर छलक रही है।