तालन पै ताल पै तमालन - श्री पद्माकर
शरद ऋतु की उज्ज्वल चाँदनी सरोवरों पर, ताल एवं तमाल के वृक्षों पर, गले की मालाओं पर, वृंदावन की गलियों में तथा विहार-स्थल बंशीवट पर सर्वत्र फैल गई है।
ब्रज-रसिक संतों द्वारा रचित कवित्त, भक्ति की रसपरक साधना का एक अनमोल स्रोत हैं। इन पदों के श्रवण और गायन से साधक के हृदय में श्रीराधा-कृष्ण के प्रति गहन अनुराग स्वतः उत्पन्न होता है। यह संकलन विशेष रूप से उन साधकों के लिए प्रस्तुत है, जो रस-मार्ग की भावना को हृदयंगम करना चाहते हैं। इसमें चयनित कवित्तों को उनके भावपूर्ण अर्थ सहित समर्पित भाव से संकलित किया गया है।
368 कवित्त उपलब्ध हैं
शरद ऋतु की उज्ज्वल चाँदनी सरोवरों पर, ताल एवं तमाल के वृक्षों पर, गले की मालाओं पर, वृंदावन की गलियों में तथा विहार-स्थल बंशीवट पर सर्वत्र फैल गई है।
श्री राधा साक्षात सौंदर्य की गोपिका तथा अनंत प्रेम की मधुर गीतिका हैं; वे बरसाने की लाड़ली किशोरी और महाराज वृषभानु की सुपुत्री हैं।
चाहे कोई मुझे दुराचारिणी कहे, कुलीन अथवा अकुलीन कहे, दरिद्र, कलंकिनी या कुल की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली स्त्री कहे, मुझे इन बातों की तनिक भी परवाह नहीं है।
हे मेरे बावले मन! यदि तू परम सुख और विश्राम की प्राप्ति चाहता है, तो व्यर्थ के सांसारिक विषयों और प्रपंचों को त्यागकर श्रीराधिका के नाम का ही निरंतर स्मरण क्यों नहीं करता?
हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है।
मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।
जिनकी लीलाएँ, नाम, रूप और शक्तियाँ अनंत हैं तथा जिनका कोई पार नहीं पा सका है।
इस संसार में वृक्ष केवल रस के प्रभाव से ही सीधे खड़े हैं, उनके पत्ते रस के कारण ही हरे-भरे हैं, वे फूलों से लदे हुए हैं और इस रस ने ही संपूर्ण प्रकृति को जीवन प्रदान किया है।
यही वह स्थान है जो यमुना जी के तट के बिल्कुल निकट है और कभी परम तपस्वी सौभरि ऋषि की पवित्र तपोभूमि हुआ करता था।
मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। [1]
श्री राधारानी के चरण अत्यंत सुंदर, हितकारी और भक्तों के मन को प्रिय लगने वाले हैं, जो सभी संकटों का हरण करने वाले तथा ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाले हैं।
त्रिभंगीलाल श्री कृष्ण के टेढ़े-सुंदर नयन, टेढ़े मुख से कहे गए रसमय वचन, टेढ़ा मुकुट और उनकी रहस्यमयी बाते मन को मोह लेती हैं।
वह दिन कब आएगा जब मैं श्री वृन्दावन की लताओं के मध्य ऊँचे स्वर में 'श्री राधिका! श्री राधिका!' पुकारूँगी और श्री धाम के उस परम-रस में मेरी गति और बुद्धि पंगु (स्तब्ध) हो जाएगी?
हे किशोरी जी! न जाने कब मेरे हृदय रूपी क्यारी में दिव्य भगवद्-प्रेम का बीज अंकुरित होगा, और कब आप मुझे रससिक्त रसिक प्रेमियों का संग प्रदान करेंगी?
जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।
वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं।
हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।
आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है – ठाकुर जी के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), उनके मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है।
श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो।
हमारे मन के लिए प्यारे ब्रजवल्लभ के दर्शन ही महान सुखस्वरूप और सदा शांति के धाम हैं।