सुविचार

रसिक संतों के छंद दोहे, जो रसोपासना का मानो आधार है और वृंदावन का रस प्राप्त करने का साधन है । रसिक संतों के काव्यों में इनको साखी का नाम भी दिया गया है ।

3406 छंद उपलब्ध हैं

  1. भ्रंसिन्या - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (49)

    अरे मन! श्री कृष्ण के चरण कमलों के प्रेमधन को नष्ट कर देने वाली स्त्रियों के परिहासमय स्नेह वचनों में फँस कर प्रेमधन से वञ्चित मत हो। पुत्र-मित्र-वैभवों को नश्वर जान कर उनकी आकांक्षा मत करो। निरन्तर राधादास्य प्रदानकारी वृषभानुनन्दिनी सरसी अर्थात् श्री राधाकुण्ड का ध्यान करो।

  2. गौरांगी श्रीराधिका प्रीतम की उरहार- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (01)

    गोरे अंगों वाली श्रीराधिका अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के हृदय का हार हैं। वे सबके मन को मोहने वाले (मनमोहन) श्रीकृष्ण के मन को भी मोहने वाली हैं तथा अत्यंत कृपालु और परम उदार हैं।

  3. प्रात: काल ही ऊठि के - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (04)

    श्री हरिव्यास देवाचार्य कहते हैं कि इस रसोपासना मार्ग के साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल उठकर सखी का बाह्य वेश धारण न करे, अपितु सखीभाव को अपने अंतःकरण में धारण करे। उस अन्तःचिन्तित सखीभाव के द्वारा वह अपने निज स्वरूप—अर्थात् निकुञ्ज में स्थित अपने नित्य सेवामय (या गुरुप्रदत्त सिद्ध) स्वरूप—से भावपूर्वक एकरूप हो। नित्य सहचरी-स्वरूप की सेवा में प्रविष्ट होने का यही एक उपाय है।

  4. जो मन मोहन करत बस - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (94.3)

    जो मनमोहन (श्री कृष्ण) संपूर्ण संसार को अपने वश में कर लेते हैं और जो सभी के चित्त को चुराने वाले हैं, वे स्वयं भी इस ‘राधा’ नाम को, अत्यंत प्रेमपूर्वक, रात-दिन निरंतर जपते रहते हैं।

  5. गीता ओ भागौत कौ कान्त - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (6)

    श्री कान्त रसिक जी कहते हैं कि भले कोई श्री गीताजी और श्रीमद्भागवत महापुराण का कितना ही बड़ा उपदेश क्यों न दे, किन्तु यदि उनका हृदय पत्थर के समान कठोर है, तो वे रसोपासना के वास्तविक रहस्य को नहीं समझ सकते। इस अनन्य रसिकों के देश (नित्य वृन्दावन) में प्रवेश केवल प्रेममय हृदय वाले रसिक ही कर सकते हैं।

  6. पिय कौ मन प्यारी प्रिया - ब्रज के दोहे

    श्री राधा श्रीकृष्ण के हृदय की अधीश्वरी हैं और श्रीकृष्ण श्री राधा के हृदय के अधीश्वर हैं। वे परस्पर एक-दूसरे के हृदय में विराजमान हैं। इसी एकात्म भाव के कारण वे एक-दूसरे के वर्ण के अनुरूप वस्त्र धारण करते हैं (अर्थात् श्री राधा नीले वस्त्र तथा श्रीकृष्ण पीले वस्त्र धारण करते हैं) और साथ-साथ एक ही चाल से विहार करते हैं।

  7. वत्सलता अरु अभय सदा आरत-अघ-सोखन - श्री चतुर्भुजदास जी

    श्री कृष्ण के गुणों का वर्णन करते हुए श्री चतुर्भुज दास कहते हैं कि वे सदैव वात्सल्य और करुणा से परिपूर्ण रहते हैं तथा अपने शरणागत को निर्भयता प्रदान करते हैं। वे पापों का नाश करने वाले, दीनों के सच्चे मित्र तथा सुख के अथाह सागर हैं। वे समस्त सुखों के दाता हैं और दुःखों का निवारण करने वाले हैं।

  8. राधा पदाब्जसेवान्यस्पृहा - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.34)

    भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों में श्रीराधा-दासी को श्रीराधा के चरण-कमलों की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती। वह श्रीराधा के विशुद्ध प्रेम से प्रकट होने वाले असीम रस-सागर में सदा निमग्न रहती है।

  9. जो बोले तो हरि-कथा नहीं - श्री चरणदास, भक्ति सागर

    भक्ति-मार्ग के साधक की रहनी का वर्णन करते हुए श्री चरणदास जी कहते हैं कि यदि मुख से कुछ बोले, तो केवल श्रीहरि-कथा ही बोले; अन्यथा शांत रहकर मौन धारण करे। आवश्यकता पड़ने पर ही आवश्यक बात कहे, अन्यथा भूलकर भी कभी मिथ्या, कड़वे या दुर्वचन न बोले।

  10. मेरै सरवस धन तुमहिं - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रति विलास (02)

    हे मेरे प्राणों की वल्लभा श्री राधे! आप ही मेरा सर्वस्व और एकमात्र धन हैं। आप ही मेरी रति (प्रेम), मेरी बुद्धि, मेरी परम गति, मेरी रक्षक (स्वामिनी) और पालनकर्ती हैं।

  11. कुँवरि चाल सखि देखि कै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, रंग हुलास (43)

    श्री राधा की परम मनोहर चाल को देखकर श्रीकृष्ण अपनी ही गति-मति भूल गए। श्री राधा जू के विशाल नेत्रों की रसभरी चितवन को निहारकर वे चित्र के समान खड़े के खड़े रह गये।

  12. ये दोउ विहरत आनन्द उदित - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (20)

    दोनों श्री युगल (श्यामा-कुंजबिहारी) नित्य विहार कर रहे हैं। उनके मन में अद्भुत आनन्द उदित हो रहा है और उनका परस्पर अनुराग मानो अंगराग के समान उनके अंग-अंग में व्याप्त हो रहा है। इस दिव्य प्रेम-विहार को देखकर श्री नागरीदासी आनन्द से फूली नहीं समा रही और उस नूतन सुहाग-रूपी पराग का प्रभाव उनके अंग-अंग एवं रोम-रोम में भी व्याप्त हो रहा है।

  13. न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (41)

    भगवान कहते हैं— मेरे परम पावन धाम ब्रज की प्राप्ति न तो पुण्य कर्मों से होती है, न दान से, न तपस्या से और न ही स्तुति-प्रार्थनाओं से। विविध प्रकार के योग-साधनों द्वारा भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह दिव्य धाम केवल मेरी अहैतुकी कृपा और अनुग्रह से ही प्राप्त होता है।

  14. मुरली मधुर बजाय के हँसत - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (03)

    जब घनश्याम (श्री कृष्ण) अपनी मुरली की मधुर तान छेड़कर मंद-मंद मुस्कुराते हैं, तब उनकी वह मुस्कान ऐसी प्रतीत होती है मानो गहरे नीले बादलों (श्याम शरीर) के बीच बिजली (दमक) चमक रही हो।

  15. रचिवे वारौ जगत को विधि - ब्रज के दोहे

    जब संपूर्ण संसार की रचना करने वाले विधाता ब्रह्मा जी ने श्री राधा के समान दूसरी स्त्री बनाने का विचार किया, तब वे मानो बावले हो गए, क्योंकि श्री राधा महारानी जू के समान दूसरी कोई अन्य हो ही नहीं सकती।

  16. जब परसे प्यारी-चरन परम-प्रीति - श्री सूरदास, सूर सागर (3446.36)

    जब परम स्नेही नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ने अत्यधिक प्रेम के साथ अपनी प्यारी श्रीराधा के चरणों का स्पर्श किया, तब प्रियाजी का मान (रूठना) समाप्त हो गया और वे प्रसन्न हो उठीं, जिससे विरह का सारा दुःख और द्वंद्व पूरी तरह मिट गया।

  17. आय निकस ठाड़े भये थकित - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (282)

    जैसे ही वे (प्रिया-प्रियतम) वंशीवट में आकर खड़े हुए, उनकी अद्भुत रूप-माधुरी को देखकर सखियाँ ठगी सी रह गईं; उनके नेत्रों की पलकें झपकना भी भूल गईं, मानो वे किसी सम्मोहन में पूरी तरह ठग ली गई हों।

  18. जो कराय सो कीजिये जो - श्री सरस माधुरी

    भगवान के वास्तविक भक्त के लक्षण बताते हुए सरस माधुरी कहते हैं कि प्रभु उससे जो कराते हैं, वह उसी में अपनी प्रसन्नता मानता है। वे जो सुख-दुःख अथवा जीवन की परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, उन्हें वह प्रभु का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार करता है। प्रभु उसे जहाँ रखते हैं, वह वहीं संतोषपूर्वक रहता है। यही एक सच्चे दास का धर्म एवं सर्वोत्तम साधन है।

  19. बृजे सख्य रसा विष्ठा सख्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (45, 46)

    ब्रज में सख्य रस में निमग्न श्री ललितादिक सखियाँ हैं जो श्री राधा के चरण-कमलों के बिना आधे पल का भी वियोग सहन नहीं कर सकतीं। वे श्री राधिका को ही अपना पति मानती हैं और सदा उन्हीं के आश्रय में रहकर नथ, कड़े, चूड़ियाँ, झलका आदि सौभाग्य-चिह्न धारण करती हैं।