द्वै द्वै बाँह सिलह सजैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (643)
जैसे जगत में साधारनतया दोनों हाथों में ही हथियार को सजाया जाता है, वैसे ही साधक समाज नाना प्रकार के साधन-बल का भरोसा अपने मन में रखते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि मेरे तो एक ही हाथ स्वरूप नित्यबिहार का ही अनन्य भाव से भजन, नित्य-विहार की ही लालसा सदा-सर्वदा बनी है।
