सुविचार

रसिक संतों के छंद दोहे, जो रसोपासना का मानो आधार है और वृंदावन का रस प्राप्त करने का साधन है । रसिक संतों के काव्यों में इनको साखी का नाम भी दिया गया है ।

3451 छंद उपलब्ध हैं

  1. द्वै द्वै बाँह सिलह सजैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (643)

    जैसे जगत में साधारनतया दोनों हाथों में ही हथियार को सजाया जाता है, वैसे ही साधक समाज नाना प्रकार के साधन-बल का भरोसा अपने मन में रखते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि मेरे तो एक ही हाथ स्वरूप नित्यबिहार का ही अनन्य भाव से भजन, नित्य-विहार की ही लालसा सदा-सर्वदा बनी है।

  2. किरीटकेयूरधरे नूपुराभातपादुके - सनत्कुमार संहिता, श्रीराधास्तोत्रं (5)

    हे मुकुट और केयूर धारण करने वाली! जिनके चरण नूपुरों की शोभा से सुशोभित हैं, तथा जो अनेक दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं, ऐसी श्री राधिके! मुझ पर कृपा कीजिए।

  3. ब्रज बीथिन्ह जब सांवरो चलै - ब्रज के दोहे

    जब साँवले श्रीकृष्ण ब्रज की गलियों में मदमस्त हाथी की भाँति अत्यंत सुंदर-मतवारी चाल से चलते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके संग-संग प्रतिपल अद्भुत सौंदर्य की वर्षा हो रही हो।

  4. श्री राधा बृजराज को नित - श्री मलूक दास जी की वाणी, श्रीराधाकृष्ण व्याहुला (2)

    हमें प्रतिदिन निरंतर श्री राधा जी और ब्रजराज श्री कृष्ण का ध्यान करना चाहिए। स्वयं भगवान ने अपने श्रीमुख से यह वर्णन किया है कि उनके संत ही उनका वास्तविक स्वरूप हैं।

  5. ओर मिले वन ना मिले - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (16)

    जिसके हृदय में निरन्तर यह विचार और उत्कण्ठा बनी रहती है कि चाहे संसार की अन्य वस्तुएँ मिलें या न मिलें, पर मुझे श्री धाम वृन्दावन वास अथवा आश्रय अवश्य ही प्राप्त हो, ऐसे व्यक्ति की चरण-रज को ढूँढ़कर, बार-बार अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए।

  6. ऐसौ अद्भुत प्रेम है दम्पति - श्री सरस माधुरी

    दिव्य दम्पति के अंगों में परस्पर ऐसा अद्भुत और विलक्षण प्रेम व्याप्त है कि वे नित्य निरंतर सर्वदा एक-दूसरे के साथ ही रहते हैं, फिर भी उन्हें कभी तृप्ति नहीं होती है।

  7. रस मैं मगन बिहारिनी दिय - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रस मंजरी (2)

    परम रस में निमग्न श्री विहारिणीजी (श्री राधा) ने अपने प्रियतम श्री कृष्ण के गले में अपनी भुजा डाली हुई है। इस अत्यंत सुंदर और सलोनी शय्या पर विराजमान यह युगल समस्त सौंदर्य की चरम सीमा प्रतीत हो रहा है।

  8. कुँवरि छबीली अमित छबिछिन -छिन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत (1.54)

    नित्य-किशोरी श्री राधा का सौंदर्य असीम और अपार है, जो प्रत्येक क्षण नित-नवीन रूप धारण करता रहता है। उनका दर्शन करके रसिक-शिरोमणि श्री श्यामसुंदर भी स्तब्ध होकर चित्रलिखित (चित्र की भाँति अचल) खड़े के खड़े रह गए हैं।

  9. लगी समाधि बिहार की छुटै - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (319)

    श्री हरिदासी (स्वामी श्री हरिदास जी) के निकुंज-धाम में श्री गौर-श्याम (श्री राधा-कृष्ण) सदैव निरंतर विहार करते रहते हैं। इस दिव्य युगल-विहार की ऐसी अखंड समाधि लग गई है, जो दिन-रात कभी भी भंग नहीं होती है।

  10. भासा यस्याः कृष्णदेहोऽपि गौरो - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (04)

    जिनकी आभा से इन्द्रनील-मणि के समान श्याम श्रीकृष्ण का शरीर भी गौर प्रतीत होने लगता है, और जिनके प्रभाव से भौंरे, कौए तथा कोयल भी गौरवर्ण से प्रतीत होते हैं, उस जगत् की धात्री श्रीराधिका को प्रणाम है।

  11. कामधेनु कलपत रही हौं न भई ब्रज गाय- ब्रज के दोहे

    स्वर्ग की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु भी इसी लालसा में तरसती रह गई कि वह ब्रज की साधारण गाय क्यों नहीं बनी। यदि वह ब्रज की गाय होती, तो श्री राधा जी स्वयं दूध दुहने का पात्र (दोहनी) हाथ में पकड़तीं और श्री कृष्ण आकर उसे दुहते।

  12. सरस-सुगन्ध-मन्द मलयानिल विहरत - श्री सूरदास, सूर सागर (4891)

    श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में रसमयी, सुगंधित और मंद-शीतल मलय पवन बहती है। श्री धाम वृंदावन में जो अलौकिक प्रेम-क्रीड़ा होती है, वैसी विहार लीला तीनों लोकों में कहीं भी नहीं है।

  13. तुमसे हम को एक है - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

    हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही एकमात्र शरण व सर्वस्व हैं, किंतु आपके लिए तो मेरे जैसे अनगिनत जीव व अनुरागी हैं। अतः हे प्राणप्रियतम! आप जैसा भी उचित समझें वैसा व्यवहार करें, बस ऐसी कृपा करें कि हमारे इस निष्काम प्रेम की प्रतिज्ञा का सदा निर्वाह होता रहे।

  14. जोग जज्ञ तप नाम बिनु - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    श्री भगवन्नाम के बिना योग, यज्ञ, तपस्या आदि समस्त साधन निष्फल हो जाते हैं। श्री गुरु छौना जी कहते हैं कि जैसे सेमर के वृक्ष का यत्नपूर्वक पालन करने पर, फल पकने पर भी भीतर से केवल व्यर्थ रुई (कपास) ही निकलती है, कोई खाने योग्य फल नहीं मिलता, वैसे ही नाम-हीन साधन भी निष्फल सिद्ध होते हैं।

  15. अहो कुँवरि तुब रूप यह - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)

    हे किशोरी जी (श्रीराधा)! आपका यह अनुपम सौन्दर्य किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करता। आपकी स्मृति मुझे अपनी सुध-बुध भुला देती है और मेरे हृदय के मर्मस्थल को प्रेम-बाणों से निरन्तर बींधती रहती है।

  16. टेरत राधा-नाम टरे न मुख - श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (36)

    श्री राधा के वियोग में श्री कृष्ण 'राधा' नाम की निरंतर पुकार कर रहे हैं, एक क्षण को भी मुख से नहीं भुला रहे। समस्त विश्राम को त्याग कर अब तो केवल यही लालसा है कि कब प्रिया जी की उस बाँकी चितवन की रसमय झाँकी प्राप्त होगी।

  17. धन हित सटकौ अनत कौ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (16)

    यदि धन-संपदा की तृष्णा के वशीभूत होकर मैं श्रीधाम वृन्दावन को पीठ दिखाकर किसी अन्य स्थल की ओर पलायन करूँ, तो मैं अपने ही नेत्र फोड़ लेने योग्य हूँ।।

  18. श्री विपुल बिहारनिदास को मैं पायो - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (17)

    श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उन्हें श्री विट्ठलविपुल देव जी तथा श्री बिहारिन देव जी का पूर्ण सत्संग प्राप्त हुआ है। ऐसे अनन्य रसिकों के प्रभाव से श्री प्रिया-प्रियतम के प्रति जो अनन्य अनुराग प्रकट हुआ है, उससे उनका चित्त नित्य प्रफुल्लित और आनंदित रहता है।