प्रभु मैं पीछौ लियौ तुम्हारौ - श्री सूरदास, सूरसागर (218)
हे प्रभु! मैंने अब आपका पीछा पकड़ लिया है, अर्थात् अब मैं आपकी अनन्य शरण में आ गया हूँ। आप तो दीनों पर दया करने वाले कहे जाते हैं, अतः मेरी समस्त विपत्तियों को टाल दीजिए।
रसिकों द्वारा लिखी गई वाणी वृंदावन एवं ब्रजरस का मूल स्रोत है। जिसको भी इस रस में आगे बढ़ना है उसे इन वाणियों का आश्रय लेना होगा एवं रसिकों द्वारा बताए गए मार्ग में चलना होगा।
2735 संकीर्तन उपलब्ध हैं
हे प्रभु! मैंने अब आपका पीछा पकड़ लिया है, अर्थात् अब मैं आपकी अनन्य शरण में आ गया हूँ। आप तो दीनों पर दया करने वाले कहे जाते हैं, अतः मेरी समस्त विपत्तियों को टाल दीजिए।
हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।
हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
हे सखी! सुनो, अब प्रेम-रस की वर्षा होने वाली है। मैं अभी उनके घर से यह बात सुनकर आई हूँ कि हमारे प्यारे श्री राधा-कृष्ण का परस्पर मंगलमय विवाह होने वाला है।
आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है – ठाकुर जी के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), उनके मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है।
स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।
संपूर्ण सौंदर्य की पराकाष्ठा और समस्त कलाओं की परम ज्ञाता (सुजान) श्री राधा महारानी जू ही मेरी एकमात्र आराध्या स्वामिनी हैं।
श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।
चारों दिशाओं से उमड़-उमड़कर कामदेव के अनुराग से सराबोर श्याम घटाएं घिर आई हैं। उन मेघों में सौंदर्य रूपी अमृत से भरी हुई बिजली चमक रही है, जिससे संपूर्ण वन की शोभा अत्यंत हरी-भरी हो गई है।
साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।
इस संसार में प्रभु के केवल दो प्रकार के सच्चे दास (भक्त) होते हैं—एक वे, जो नियमों का दृढ़ता से पालन करने वाले नेमी हैं, और दूसरे वे, जो अनन्य भाव में डूबे हुए प्रेमी हैं।
श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो।
धन्य हैं श्री वृन्दावन के लवा और बटेर पक्षी। बाज के भय से वे दिन-रात कुंजों की ओट के भीतर दुबकेहुए बैठे रहते हैं, फिर भी कभी वृन्दावन छोड़कर बाहर नहीं जाते और सदा कुंजों की शरण लिए रहते हैं।
हमारे मन के लिए प्यारे ब्रजवल्लभ के दर्शन ही महान सुखस्वरूप और सदा शांति के धाम हैं।
हे ललित लाड़ैती श्री राधे! आपके दर्शन किए बिना बहुत दिन बीत गए हैं। यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो और उसी के कारण आप मुझसे विमुख अथवा उदास हो गई हों, तो कृपापूर्वक उस अपराध को अब क्षमा कर दीजिए और मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए।
श्री श्यामसुन्दर अपने सुन्दर मुकुट की छाया से शोभायमान होकर निकुञ्ज से बाहर आ रहे हैं और अपनी प्रियतमा श्री राधा (भावती) को साथ लिए हुए हैं।
जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।
नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं।
परम स्नेही केवल एक श्रीविहारी और श्रीविहारिणी ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं।
परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं।