जदपि अपराध सतत बहु कीन्हो - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
यद्यपि मैंने निरंतर अनेक अपराध किए हैं, फिर भी हे कृपा के सागर श्री वृंदावन धाम! आपने मुझे अपनी शरण में लेकर यहाँ निवास प्रदान किया है।
रसिकों द्वारा लिखी गई वाणी वृंदावन एवं ब्रजरस का मूल स्रोत है। जिसको भी इस रस में आगे बढ़ना है उसे इन वाणियों का आश्रय लेना होगा एवं रसिकों द्वारा बताए गए मार्ग में चलना होगा।
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यद्यपि मैंने निरंतर अनेक अपराध किए हैं, फिर भी हे कृपा के सागर श्री वृंदावन धाम! आपने मुझे अपनी शरण में लेकर यहाँ निवास प्रदान किया है।
हे स्वामिनी जू (श्री राधा)! कृपा करके अपनी मंगलमयी कृपा-दृष्टि से मेरी ओर निहारिए। ही सर्वज्ञ, परम सुजान एवं सर्व-शिरोमणि! मेरी अज्ञानता और मूर्खता को दूर कर दीजिए।
हे श्री विहारिणी जी! यह संपूर्ण लीला-विलास और ऐश्वर्य आपका ही विस्तार है। प्रियतम श्री विहारी जी सदा आपके ही रुख (संकेत और इच्छा) की ओर निहारते रहते हैं और उसी के अनुसार अनंत क्रीड़ाओं की रचना करते हैं।
श्री राधावल्लभ लाल की जय हो, जो श्री वृन्दावन में यमुना जी के तट पर सर्वदा निवास करते हैं।
जिन रसिकों एवं महापुरुषों का हमें नित्य संग करना चाहिए, उनसे तो लोग प्राय: सदा दूर रहते हैं और जिन सांसारिक वासनाओं से युक्त लोगों से दूर रहना चाहिए, उनसे चुंबक की तरह मन चिपका रहता है।
मेरा मन श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्त हो गया है।
ब्रजमंडल में साक्षात् परम निज धाम प्रकट हुआ है, जहाँ समस्त देवता और असुर भी इस पावन भूमि का आश्रय लेने के लिए शरीर धारण करके निवास कर रहे हैं।
श्री राधिका रानी के गले में हीरों के मनमोहक हार सुशोभित हैं, तथा वे गजमुक्ताओं (श्रेष्ठ मोतियों) के अत्यंत सुखदायक गजरे धारण किए हुए हैं।
हे बनवारी! अब भला मेरी बात कौन सुनेगा? मुझे आपके समान कोई दूसरा सामर्थ्यवान दिखाई नहीं देता, फिर मैं अपनी अंतःकरण की पीड़ा और किससे जाकर कहूँ?
श्री राधा-कृष्ण दोनों ही अत्यंत सुंदर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते समय वे परस्पर एक-दूसरे के ऊपर झुकते और गिरते हैं, जिससे उनके अंग-अंग से अद्भुत सौंदर्य की हिलोरें उठ रही हैं।
हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।
वह दिन कब आएगा जब मैं श्री वृन्दावन की लताओं के मध्य ऊँचे स्वर में 'श्री राधिका! श्री राधिका!' पुकारूँगी और श्री धाम के उस परम-रस में मेरी गति और बुद्धि पंगु (स्तब्ध) हो जाएगी?
हे प्यारी किशोरी जी! आप सदैव मेरे नेत्रों में निवास करें। आप श्री वृन्दावन के निकुञ्ज भवन में वास करती हैं, जहाँ ललिता आदि सखियाँ निरंतर आपकी सेवा में आपके साथ रहती हैं।
यह बार सर्वस्व विदित है कि श्रीहरि समस्त ठाकुरों के भी ठाकुर हैं, किन्तु उन सर्वेश्वर श्रीहरि की भी स्वामिनी श्रीराधा हैं। प्राणप्रिय श्रीकृष्ण अपना सारा मान-अभिमान त्यागकर अपनी स्वामिनी श्री राधा से प्रेम की याचना करते रहते हैं और अपना समस्त प्रभुत्व छिपाकर उनके प्रेम के अधीन होकर ही रहते हैं।
हे किशोरी जी! न जाने कब मेरे हृदय रूपी क्यारी में दिव्य भगवद्-प्रेम का बीज अंकुरित होगा, और कब आप मुझे रससिक्त रसिक प्रेमियों का संग प्रदान करेंगी?
हे भगवन्! यदि आप मुझ दीन-हीन की दशा सम्भाल लेंगे और मुझे अपने चरणों की सेवा में लगा लेंगे, तो इसमें आपका क्या बिगड़ेगा?
हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।
ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं।
श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।
The sakhīs repeatedly offer their very lives for Śrī Yugala, waving water over Them and drinking it—a loving and auspicious ritual in which water is waved over the beloved ones so that no obstacle or inauspiciousness may ever touch Them.