ब्रज रसिक संकीर्तन व वाणी

रसिकों द्वारा लिखी गई वाणी वृंदावन एवं ब्रजरस का मूल स्रोत है। जिसको भी इस रस में आगे बढ़ना है उसे इन वाणियों का आश्रय लेना होगा एवं रसिकों द्वारा बताए गए मार्ग में चलना होगा।

2825 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. जुव कवनी वैस किसोर दोऊ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (110)

    सुन्दर युगल-किशोर, श्रीश्यामा-श्याम सघन निकुंज से निकलकर एक साथ खड़े हुए हैं। दोनों के तन एक-दूसरे के तन में समाए हुए हैं और दोनों के मन एक-दूसरे के मन में सुशोभित हो रहे हैं। दोनों ओर से उनकी छवि ऐसी बढ़ रही है, मानो दामिनी और नव मेघ सुशोभित हैं।

  2. सुंदर-बदन राधे सोभा को सदन - श्री मतिराम

    हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है।

  3. आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी

    मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।

  4. तुम तजि और कौन पै जाउँ - श्री सूरदास, सूरसागर (164)

    हे प्रभु! आपको छोड़कर मैं और किसके पास जाऊँ? मैं किसके द्वार पर जाकर अपना सिर झुकाऊँ और दूसरों के हाथों अपने-आप को क्यों बेचूँ, अर्थात् किसी अन्य का आश्रय क्यों लूँ?

  5. श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    श्री वृन्दावन धाम पूरी तरह से श्री राधाजी के स्वरूप से ओत-प्रोत है, जहाँ प्रतिदिन, हर क्षण और आठों पहर निरंतर केवल 'राधा-राधा' नाम का ही संकीर्तन होता रहता है।

  6. करौ कृपा नव नागरी अद्भुत - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (18)

    हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे।

  7. सुखनिधि सुन्दरि सरसनी सुनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (92)

    हे सुख-समुद्र-रूपा सुन्दरीजू, हे स्वामिनीजू, मेरी बात सुनिये! आप ही रस को उद्दीप्त करने वाली हैं। हे श्रीराधा गोरीजू, हे प्रियाजू, आपकी सदा जय हो। आप मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं सदा आपकी दासी बनी रहूँ।

  8. हरिजन रोइ रोइ सुख पावें - श्री हित रूप लाल

    श्रीहरि के वास्तविक प्रेमी भक्त उनके लिए आँसू बहाकर, अर्थात् हरि के लिए रो-रोकर ही परम सुख (रस) प्राप्त करते हैं। वे अपने तन को विरह की अग्नि-रूपी भट्टी में तपाकर, अपने हृदय में प्रियतम से मिलन की चाह-रूपी धातु को और अधिक सरस एवं प्रेममय बनाते हैं।

  9. आरति आनि सहचरिज साजी मनिमय - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (5)

    सहचरियों ने आकर प्रियालाल की अद्भुत आरती सजाई है, जिसमें मन रूपी थाल है, प्रेम रूपी बाती है और लाड़िली-लाल को रस-विलास कराने की अनन्त रुचियों का घी और कपूर सुशोभित हो रहे हैं।

  10. रस ही सों तरु ठाढ़े - ब्रज के कवित्त

    इस संसार में वृक्ष केवल रस के प्रभाव से ही सीधे खड़े हैं, उनके पत्ते रस के कारण ही हरे-भरे हैं, वे फूलों से लदे हुए हैं और इस रस ने ही संपूर्ण प्रकृति को जीवन प्रदान किया है।

  11. यहीं तो थी कभी ऋषि - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (20)

    यही वह स्थान है जो यमुना जी के तट के बिल्कुल निकट है और कभी परम तपस्वी सौभरि ऋषि की पवित्र तपोभूमि हुआ करता था।

  12. पिय तेरी चितबन ही में - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    हे प्रियतम! तुम्हारी चितवन में ही कोई अद्भुत जादू है। जब से मैंने तुम्हारे इस लावण्यमयी सुंदर मुख के दर्शन किए हैं, तब से मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ भूल गई हूँ।

  13. तेरौ मुख पीयूष पंक प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (20)

    श्री कृष्ण कहते हैं—हे प्यारी श्रीराधे! आपका मुख अमृतमय सरोवर के समान है और उसमें आपके दोनों नेत्र दो नीलकमलों के समान प्रकट हो रहे हैं। मेरा मन मतवाले भ्रमर के समान होकर उन दोनों नीलकमल रूपी नेत्रों में जा बसा है, यहाँ तक कि वह उनकी पुतलियों के भीतर ही निवास करने लगा है।

  14. किशोरी तोरी किरपा को आधार - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (118)

    हे किशोरी जी (श्री राधा)! मेरे जीवन का एकमात्र आधार आपकी अहैतुकी कृपा ही है; मैं प्रतिपल इसी आस में आपकी बाट जोहता हूँ कि कब आपके अपार रूप-सौंदर्य के दर्शन होंगे।

  15. हमें शास्त्र की समझ न परि हैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (153)

    हमें शास्त्रों की कोई समझ नहीं है और न ही हम उन्हें समझना चाहते हैं। जो लोग इन्हें अब तक नहीं समझ पाए वे आगे भी नहीं समझेंगे, परंतु जिन महापुरुषों ने शास्त्रों के वास्तविक सार को समझा है, उन्होंने जो करने को कहा है, हम केवल उसी का पालन करेंगे।

  16. प्यारी की सहेली निज जानिक - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (55)

    मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। [1]

  17. कोउ कहै उद्दिम साधि उपाधि - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (14)

    कोई कहता है कि कठिन पुरुषार्थ का साधन करके सांसारिक बाधाओं को दूर करो, किंतु उस अत्यंत गंभीर और अगाध प्रेम-मार्ग की बात को कोई केवल अपने बल पर हृदय में कैसे धारण कर सकता है? कोई चतुरता और युक्तियों पर विचार करने की सलाह देता है, तो कोई इस सत्य को नहीं समझ पाता कि काल के वश में होकर यह अमूल्य जीवन और धन व्यर्थ ही बीता जा रहा है।

  18. ब्रज की बलि आजु निकुञ्जन - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (80)

    आज निकुंजों में ब्रज के प्राण-सर्वस्व असीम सुख की वर्षा कर रहे हैं, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं।

  19. आनँद भवन वृषभान कै - श्री चतुर्भुज दास

    राजा वृषभान के घर में आज परम आनंद का धाम छा गया है, क्योंकि माता कीर्ति के महल में एक ऐसी लाड़ली पुत्री ने जन्म लिया है, जिसके समान अलौकिक और सुंदर कोई दूसरी किशोरी इस संसार में नहीं है।