ब्रज रसिक संकीर्तन व वाणी

रसिकों द्वारा लिखी गई वाणी वृंदावन एवं ब्रजरस का मूल स्रोत है। जिसको भी इस रस में आगे बढ़ना है उसे इन वाणियों का आश्रय लेना होगा एवं रसिकों द्वारा बताए गए मार्ग में चलना होगा।

2832 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. चाँपत पायँ मुदित मन सखियाँ - श्री मधुर प्रिया जी

    सखियाँ अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर श्री युगल सरकार के चरणों की सेवा कर रही हैं। वे बड़ी कोमलता से धीरे-धीरे उनके चरणों को दबा रही हैं और श्री युगल की रसमयी बातों का आनंद ले रही हैं।

  2. मेरे नंद कौ लाल जिय बस्यौ - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (429)

    हे सखी! जब से नंदजी का लाडला श्रीकृष्ण मेरे हृदय में आ बसा है, तब से मुझे समस्त सुखों की प्राप्ति हो गई है; उसने बस मेरी ओर थोड़ा-सा देखकर और मुड़कर जो मंद-मंद मुस्कान बिखेरी थी, उसी ने मेरे मन को पूरी तरह से हर लिया है।

  3. जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी

    वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, महारानी कीर्ति की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो।

  4. श्रीललिता-पद भजन दुहेलो बिना - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (33)

    श्री ललिता जी के चरणों की कृपा से प्राप्त होने वाले श्री राधा-कृष्ण के नित्य-विहार रस का भजन अत्यंत दुर्लभ और कठिन है। श्री राधारानी की अकारण करुणा के बिना इस अनुपम और निर्मल प्रेमरस का स्पर्श भला कोई कैसे कर सकता है?

  5. राधिका कौ नाम सुखधाम विसराम - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (20)

    हे मेरे बावले मन! यदि तू परम सुख और विश्राम की प्राप्ति चाहता है, तो व्यर्थ के सांसारिक विषयों और प्रपंचों को त्यागकर श्रीराधिका के नाम का ही निरंतर स्मरण क्यों नहीं करता?

  6. आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (55)

    हे सखी! आज दो दामिनियों में परस्पर होड़ लगी है। दोनों अत्यंत नवीन श्याम घटाओं के बीच रहकर उनके श्यामल रंग में रंगी हैं। एक दामिनी (बिजली) आकाश की श्याम घटाओं के बीच चमक रही है और दूसरी श्रीराधा हैं, जो श्याम मेघ के समान वर्ण वाले श्रीकृष्ण के संग शोभायमान हो रही हैं।

  7. जुव कवनी वैस किसोर दोऊ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (110)

    सुन्दर युगल-किशोर, श्रीश्यामा-श्याम सघन निकुंज से निकलकर एक साथ खड़े हुए हैं। दोनों के तन एक-दूसरे के तन में समाए हुए हैं और दोनों के मन एक-दूसरे के मन में सुशोभित हो रहे हैं। दोनों ओर से उनकी छवि ऐसी बढ़ रही है, मानो दामिनी और नव मेघ सुशोभित हैं।

  8. सुंदर-बदन राधे सोभा को सदन - श्री मतिराम

    हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है।

  9. आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी

    मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।

  10. तुम तजि और कौन पै जाउँ - श्री सूरदास, सूरसागर (164)

    हे प्रभु! आपको छोड़कर मैं और किसके पास जाऊँ? मैं किसके द्वार पर जाकर अपना सिर झुकाऊँ और दूसरों के हाथों अपने-आप को क्यों बेचूँ, अर्थात् किसी अन्य का आश्रय क्यों लूँ?

  11. श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    श्री वृन्दावन धाम पूरी तरह से श्री राधाजी के स्वरूप से ओत-प्रोत है, जहाँ प्रतिदिन, हर क्षण और आठों पहर निरंतर केवल 'राधा-राधा' नाम का ही संकीर्तन होता रहता है।

  12. करौ कृपा नव नागरी अद्भुत - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (18)

    हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे।

  13. सुखनिधि सुन्दरि सरसनी सुनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (92)

    हे सुख-समुद्र-रूपा सुन्दरीजू, हे स्वामिनीजू, मेरी बात सुनिये! आप ही रस को उद्दीप्त करने वाली हैं। हे श्रीराधा गोरीजू, हे प्रियाजू, आपकी सदा जय हो। आप मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं सदा आपकी दासी बनी रहूँ।

  14. हरिजन रोइ रोइ सुख पावें - श्री हित रूप लाल

    श्रीहरि के वास्तविक प्रेमी भक्त उनके लिए आँसू बहाकर, अर्थात् हरि के लिए रो-रोकर ही परम सुख (रस) प्राप्त करते हैं। वे अपने तन को विरह की अग्नि-रूपी भट्टी में तपाकर, अपने हृदय में प्रियतम से मिलन की चाह-रूपी धातु को और अधिक सरस एवं प्रेममय बनाते हैं।

  15. आरति आनि सहचरिज साजी मनिमय - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (5)

    सहचरियों ने आकर प्रियालाल की अद्भुत आरती सजाई है, जिसमें मन रूपी थाल है, प्रेम रूपी बाती है और लाड़िली-लाल को रस-विलास कराने की अनन्त रुचियों का घी और कपूर सुशोभित हो रहे हैं।

  16. रस ही सों तरु ठाढ़े - ब्रज के कवित्त

    इस संसार में वृक्ष केवल रस के प्रभाव से ही सीधे खड़े हैं, उनके पत्ते रस के कारण ही हरे-भरे हैं, वे फूलों से लदे हुए हैं और इस रस ने ही संपूर्ण प्रकृति को जीवन प्रदान किया है।

  17. यहीं तो थी कभी ऋषि - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (20)

    यही वह स्थान है जो यमुना जी के तट के बिल्कुल निकट है और कभी परम तपस्वी सौभरि ऋषि की पवित्र तपोभूमि हुआ करता था।

  18. पिय तेरी चितबन ही में - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    हे प्रियतम! तुम्हारी चितवन में ही कोई अद्भुत जादू है। जब से मैंने तुम्हारे इस लावण्यमयी सुंदर मुख के दर्शन किए हैं, तब से मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ भूल गई हूँ।