इस सुंदर स्थान पर स्थित सुन्दर बगीचे में एक बार श्री कृष्ण और श्री राधा रानी गोपियों के साथ लीलाओं का रस (आंनद) ले रहे थे। यह कहा जाता है कि कामदेव (कामदेव को मदन के रूप में जाना जाता है) वह श्री कृष्ण को अपने सौंदर्य से आकर्षित करने के उदेश्य ( इरादे )से यहाँ आये थे। लेकिन जब उन्होंने श्री कृष्ण को देखा, तो वह उनके अदभुत सौंदर्य से इतने आकर्षित (मोहित) हो गये कि वह पूरी तरह से विचलित हो गये और भूमि पर मूर्छित होकर गिर गये।
हित हरिवंश महाप्रभु (वृन्दावन के रसिक संत) वर्ष 1506 में श्री राधावल्लभ लालजी के साथ वृंदावन आये थे और उनकी स्थापना की । यह स्थान वृन्दावन में मदन टेर (वरहा घाट) बन गया। श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री कृष्ण की लीलाओं के साथ समय व्यतीत किया और हित चौरासी नामक वाणी ग्रन्थ की रचना की । भक्त यहाँ 'वट' वृक्ष के दर्शन भी कर सकते है जिसके नीचे श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने लीला दर्शन कर हित चौरासी लिखी।
स्थान:
मदन टेर वरहा घाट से पहले दाहिने हाथ पर परिक्रमा मार्ग पर स्थित है और वृंदावन में कलिया घाट के लगभग 1 किमी पीछे है।