बेलवन

बेलवन

रामकृष्ण सखा सह ए बिल्ववनेते । पक्का बिल्वफल भुञ्जे महाकौतुकेते ॥ बेल वन श्री यमुना देवी की दूसरी तरफ वृंदावन में स्थित है। वृंदावन से बेलवन जाने का सबसे छोटा मार्ग यह है: एक कच्चा रास्ता है और यमुना नदी पर छोटा पुल है जो वंशीवट, धीर समीर आदि के पास है और यह मानसरोवर, बेलवन को जाता है। भगवान श्री कृष्ण के अवतार काल में इन वनो को बेल वन कहा जाता था क्योंकि यहाँ बेल के घने वृक्ष थे। श्री कृष्ण अपने सखाओं के संग गायों को चराते हुए और पके फलों का आनंद लेते हुए इस अति आकर्षक बेल वन में विभिन्न प्रकार के दैवीय लीलाओं का प्रदर्शन करते थे। यह ब्रज के बारह मुख्य वनों में से एक है। यहां देवी लक्ष्मी जी का मन्दिर है जो आज लोगों के आकर्षण का केंद्र है। रासलीला : बेलवन वह स्थान है जहां लक्ष्मी देवी तपस्या करने आयी थीं, क्यूंकि गोपियों का अनुसरण न करने के कारण उन्हें महारास में प्रवेश नहीं मिला था। "तप: सिद्धि प्रदायैव नमो बिल्ववनाय च । जनार्दन नमस्तुभ्यं बिल्वेशाय नमोस्तु ते ॥ " भविष्योत्तर पुराण [1] --- भविष्य पुराण से संस्कृत पद-- एक समय नारद जी के मुख से ब्रजेन्द्र नन्दन श्रीकृष्ण की मधुर रासलीला और गोपियों के सौभाग्य का वर्णन सुनकर श्री लक्ष्मी जी के हृदय में रासलीला दर्शन की प्रबल उत्कण्ठा हुई। अनन्य प्रेम की स्वरूपभूता विशुद्ध प्रेम वाली गोपियों के अतिरिक्त और किसी का भी रास में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। वह प्रवेश केवल महाभाव-स्वरूपा कृष्ण कान्ता शिरोमणि राधिका और उनकी स्वरूपभूता गोपियों की कृपा से ही सुलभ है। अत: यहीं पर उन्होंने कठोर तपस्या की, फिर भी उन्हें रास लीला में प्रवेश संभव नहीं हो सका। वे आज भी रास में प्रवेश के लिए यहाँ तपस्या कर रही हैं। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में इसका वर्णन किया गया है। कालिया नाग की पत्नियाँ श्री कृष्ण की स्तुति करती हुई कह रही हैं-' भगवन! हम समझ नहीं पातीं कि यह (कालिय नाग की) किस साधना का फल है, जो यह आपके श्री चरणों की धूलि पाने का अधिकारी हुआ है। आपके श्री चरणों की रज इतनी दुर्लभ है कि उसके लिए आपकी अर्द्धांंगिनी श्री लक्ष्मी जी को भी बहुत दिनों तक समस्त भोगों का त्याग करके तथा नियमों का पालन करते हुए तपस्या करनी पड़ी थी फिर भी वह दुर्लभ श्री चरणरज प्राप्त नहीं कर सकीं।'[2] यहाँ पास में ही कृष्ण कुण्ड और श्री वल्लभाचार्य जी की बैठक भी है। रामकृष्ण सखा सह ए बिल्ववनेते । पक्का बिल्वफल भुञ्जे महाकौतुकेते ॥