गोवर्धन

गोवर्धन

श्रीकृष्ण ने श्री गिरिराज जी को अपने बाएँ हाथकी कनिष्ठ अंगुलीपर सात दिनोंतक धारणकर ब्रजकी रक्षा की और इन्द्रका गर्व चूर्ण किया था। श्रीकृष्णके नित्य अप्राकृत गोलोक वृन्दावन धामसे श्रीराधाकृष्ण युगलकी सेवाके लिए विविध प्रकारके निभृत निकुञ्जों, कन्दराओं, निर्मल सरोवरों तथा नाना प्रकारके युगल सेवोपयोगी गैरिक आदि धातुओंके साथ इन्होंने भौम ब्रजमें अवतरण किया है । तत्त्वकी दृष्टिसे कृष्णसे अभिन्न स्वरूप होते हुए भी ये हरिदासवर्य अर्थात् हरिके सेवकों में सर्वोत्तम माने गये हैं। गोपियोंने गोवर्धनको हरिदासवर्य कहकर सम्बोधन किया है । अवतरण लीला : गर्गसंहिता के अनुसार - एक समय पुलस्त्य ऋषि नाना तीर्थों में भ्रमण कर रहे थे, उस समय उन्होंने द्रोणाचल के पुत्र गोवर्द्धन को देखा, जो माधवी लता के सुमनों से आवृत्त था, वहाँ वृक्ष फल-पुष्पादि के भार से नत थे, पर्वत पर शान्ति का वास उसे और भी सुरम्य बना रहा था, इस दिव्य सौन्दर्य से आकृष्ट हो मुनि के मन में उसे प्राप्त करने की इच्छा हुई । इसके लिए वे द्रोणाचल के समीप गए । द्रोणाचल ने उनका आदर सत्कार किया । उसके बाद पुलस्त्य जी पर्वत से बोले – "हे द्रोण ! तुम पर्वतों के स्वामी हो । मैं काशी निवासी मुनि, तुम्हारे निकट याचक बनकर आया हूँ । तुम अपने पुत्र को मुझे दे दो, क्योंकि यहाँ अन्य किसी वस्तु से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ।" पुलस्त्य जी की यह बात सुनकर पुत्र स्नेह से विह्वल द्रोणाचल के नेत्रों में आँसू भर आये । अवज्ञा के भय से मना भी तो नहीं कर सकते थे । अतः बोले – “हे श्रेष्ठ मुनिवर ! मैं पुत्र स्नेह से आकुल हूँ । यह पुत्र मुझे अत्यंत प्रिय है किन्तु आपके शाप से भयभीत होकर मैं इसे आपके हाथों में देता हूँ ।" तभी गोवर्द्धन ने मुनि से कहा- "हे मुने! मेरा शरीर 8 योजन लंबा, 2 योजन ऊंचा, 5 योजन चौड़ा है । इस विशाल गिरि को आप किस प्रकार ले चलेंगे ?" पुलस्त्य जी बोले - "बेटा ! तुम मेरे हस्ततल पर बैठकर सुखपूर्वक चले चलो ।" गोवर्द्धन ने कहा –" हे मुने ! मेरी एक शर्त है..." पुलस्त्य - "वो क्या ?" गोवर्धन - “आप जहाँ कहीं भी भूमि पर मुझे एक बार रख देंगे वहाँ से मैं पुनः उत्थान नहीं करूँगा ।" मुनि - "मेरी भी प्रतिज्ञा है कि आपको मार्ग में कहीं नहीं रखूँगा ।" तदनन्तर गोवर्द्धन अपने पिता को प्रणाम करके मुनि के दाहिने हस्ततल पर आरूढ़ हुए । उस समय श्री गोवर्द्धन जी के नेत्र अश्रुपूरित हो गये । पुलस्त्य मुनि गोवर्द्धन को लेकर चल दिए । चलते-चलते ब्रज मण्डल में जब पहुँचे तो गोवर्द्धन पर्वत को स्मरण आया - दानलीलां मानलीलां हरिरत्र करिष्यति । तस्मान्मया न गन्तव्यं भूमिश्चेयं कलिन्दजा ॥ गोलोकाद्राधया सार्ध्दं श्रीकृष्णोऽत्रागमिष्यति । कृतकृत्यो भविष्यामि कृत्वा तद्दर्शनं परम् ॥ एवं विचार्य मनसा भूरि भारं ददौ करे । तदा मुनिश्च श्रान्तोऽभूद्भुतपूर्वं गतस्मृतिः ॥ करादुत्तार्य तं शैलं निधाय ब्रजमण्डले । लघुशंकांजयार्थं हि गतोऽभूद्भारपीडितः ॥ - गर्ग संहिता, वृ.ख. 2/38-41 यहाँ ब्रज में हमारे स्वामी श्री कृष्ण, प्राणेश्वरी श्रीराधा सहित अवतीर्ण होकर ग्वालबाल, गोपीजन आदि के साथ अनेकों लीला करेंगे । अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना चाहिए । ऐसा मन में विचार करके गोवर्द्धन ने अपना भार बहुत अधिक कर दिया । इससे मुनि थक गए और उन्हें अपनी शर्त याद नहीं रही । उन्होंने गोवर्द्धन को ब्रजमण्डल पर रख दिया और लघुशङ्का करने चले गये, फिर स्नान किया और गोवर्द्धन को उठाने लगे, पर ये क्या ? इन्होंने तो हिलना भी बन्द कर दिया, पुलस्त्य जी ने गोवर्द्धन से कहा- “अब उठो” ! मुनि दोनों हाथों से गोवर्द्धन को उठाने लगे, पर उठा न पाये । मुनि गोवर्द्धन से बोले "हे गिरिश्रेष्ठ ! चलो-चलो, भार अधिक मत बढ़ाओ । मैं जान गया हूँ कि तुम रूठे हुए हो । शीघ्र बताओ तुम्हारा अभिप्राय क्या है ? " गोवर्द्धन बोले - "हे मुने ! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है । आपने ही मुझे यहाँ स्थापित किया है । अब मैं अपनी प्रतिज्ञानुसार यहाँ से नहीं उठूँगा।" यह सुनकर मुनि क्रोधित हुए और उन्होंने शाप दे दिया- “तू बड़ा ढीठ है । तूने मेरा मनोरथ पूरा नहीं किया, अतः तू प्रतिदिन तिल-तिलभर क्षीण होता चला जा ।" शाप देकर मुनि काशी चले गए । तब से गोवर्धन पर्वत प्रतिदिन तिल-तिलभर क्षीण हो रहे हैं । स्थान : मथुराके पश्चिममें लगभग 14 मीलकी दूरीपर गिरिराज गोवर्धन विराजमान हैं ।