कोकिलावन

कोकिलावन

ब्रज के 137 वनों में से मुख्य 12 वनों में से कोकिला वन एक हैं । श्री कोकिला वन का प्रार्थना मन्त्र :- देवर्षिकिन्नराकीर्ण कोकिलानिर्मिताय च । बनायाल्हादपूर्णाय नमस्ते सुस्वरप्रद ॥ - नारद पञ्चरात्र कोकिला सदृश सुमधुर स्वर प्रदान करने वाले देवर्षि, किन्नर आदि महान जनों से युक्त परम आह्लाद से पूर्ण कोकिला द्वारा बनाए गये इस श्री कोकिलावन को प्रणाम है । गर्गसंहिता के अनुसार वासंती रास के समय ब्रजवधूटियों ने कोटि-कोटि कोकिलाओं से कूजित इस कोकिलावन में गोपीगीत गाकर अपने प्राणवल्लभ ब्रजेन्द्रनन्दन को प्रसन्न किया और यहीं श्री कोकिला बिहारी से उनका मिलन हुआ । वैशाख मास की पंचमी तिथि को आरम्भ हुए इस रसमय रास के मध्य ही जब रासबिहारी अन्तर्धान हो गये, तो वन वनान्तर में भ्रमण कर गोपियाँ श्रीकृष्ण का अन्वेषण करने लगीं । हिरणियों की तरह चारों ओर दूर-दूर तक देखती हैं, फिर कभी वृक्षों से, लताओं से, पृथ्वी से, श्रीयमुना से प्राणनाथ का मार्ग पूछती हैं । अनंत अगाध अपरिमित, अनिर्वचनीय, अकल्पनीय विरह की इस स्थिति ने ही गोपियों के समक्ष रासेश्वर प्रभु को अतिशीघ्र भेज दिया । गोपीगीत का उच्चगान इसी पावन स्थल "कोकिलावन" में हुआ, जिसके फल स्वरूप गोपवधुओं को श्रीकृष्ण रूपी सिद्धि सिद्ध हुई । ब्रजभक्ति विलास के अनुसार यहाँ इस बृहद वन में रत्नाकर सरोवर और रास मण्डल है । रत्नाकर सरोवर में स्नान एवं आचमन करने का प्रार्थना मन्त्र :- सख्याः क्षीरसमुद्भूत रत्नाकरसरोवरे । नाना प्रकाररत्नानामुद्भबे वरदे नमः ॥ अनेकानेक प्रकार के रत्नादि को उत्पन्न करने वाले वरदाता, सखियों द्वारा दूध से बनाये गये हे रत्नाकर सरोवर ! आपको प्रणाम है । रासमंडल का प्रार्थना मन्त्र :- रासक्रीड़ाप्रदीप्ताय गोपीरमणसुंदर । नमः सुखमनोरम्यस्थलाय सिद्धिरुपिणे ॥ हे रास क्रीड़ा से उद्भासित, मन को उल्लसित करने वाले, गोपियों की रसमयी लीलाओं से शोभायमान, सिद्धि स्वरूप रासस्थल ! आपको प्रणाम है । श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की बैठक भी यहाँ सब वैष्णवों के लिए दर्शनीय है। 252 वैष्णवन की वार्ता के अनुसार - एक वैष्णव ब्रज में अटन कर रहे थे, चून माँगते और उसी से अपना पेट भर लिया करते थे, एक दिन कोकिलावन में आये, यहाँ रसोई की, प्रभु को भोग लगाया, स्वयं पाया । उस दिन फूलडोल उत्सव था, आप भूल गये, रसोई कर लेने के बाद जब याद आया तो मन में बड़ा पश्चाताप हुआ, अब जल्दी ही एक मजबूत कुञ्ज पर लता बाँध कर प्रभु को झुलाया और दाल-बाटी का भोग धराया, उस दिन तीनों समय प्रभु को यही दाल बाटी का भोग लगाया, प्रभु पाकर बड़े संतुष्ट हुए और श्री गुसाँई जी को कहा - "जै जै ! आज तो बड़ा सुन्दर भोग पाया ।" गुसाँई जी "जै जै ! कैसा भोग? ' श्रीनाथजी - "दाल बाटी का ।" गुसाँई जी - "जै जै ! वह कहाँ से आया? " श्रीनाथजी - "एक वैष्णव ने यहीं श्री कोकिलावन में डोल के उत्सव में पवाया ।" श्रीनाथजी को बड़ी प्रसन्नता हुई, एक दिन वे वैष्णव गुसाँई जी को प्रणाम करने आये, गुसाँई जी बड़ी प्रसन्नता से बोले “आओ! आओ ! आपका भोग पाकर हमारे लाला बड़े प्रसन्न हुए ।" वैष्णव विनम्र हो बोले - "जै जै ! ये सब तो आपकी कृपा का ही फल है, जो लाल जी की इतनी कृपा वर्षा हमारे ऊपर भई नहीं तो हमारी भला क्या सामर्थ्य?" ये वार्ता यहीं इसी पावन भूमि की है । कोकिलावन विहारी के समीप ही उनके श्रेष्ठ भक्त विराजमान हैं श्री शनिदेव महाराज । हर शनिवार को जहाँ लाखों की संख्या में पहुँच कर भक्तजन आज भी दर्शन लाभ लेते हैं। स्थान : नन्दगाँवसे तीन मील उत्तर और जावटसे एक मील पश्चिममें कोकिलावन स्थित है।