लोहवन

लोहवन

लोहवन में जो काली सी मूर्ति है वह लोहजङ्घ ऋषि की है, जिसे देवताओं ने स्थापित की थी । लोहवन का नाम लोहजङ्घ ऋषि के नाम पर रखा गया है । उन्होंने यहाँ ब्रज प्राप्ति के लिए तप किया था। लोहवन की जो सबसे प्रसिद्ध लीला है, वो यह है कि इस स्थान पर जरासंध हारा था । उसने मथुरा पर आक्रमण किया था। मथुरा के बाहर यहाँ पर उसका कृष्ण-बलराम के साथ युद्ध हुआ था। वायु पुराण के अनुसार लोहवन का प्रार्थना मन्त्र : लोहजंघानसम्भूत कलाकाष्ठास्वरूपिणे । सर्ववाधाविमुक्ताय नमस्ते लोहसंज्ञके ॥ लोहजङ्घ ऋषि से उत्पन्न, कलाओं की पराकाष्ठा रूप, सभी बाधाओं से मुक्त होने के लिए आपको नमस्कार है । लोहजङ्घवनं नाम लोहजङ्घेन रक्षितम् । नवमन्तु वनं देवि सर्व पातकनाशनम् ॥ - आदि वराह पुराण हे देवि ! (पृथ्वी) लोहजङ्घ ऋषि द्वारा रक्षित लोहजङ्घ नामक नवम वन समस्त पातकों को क्षय करने वाला है । श्रीकृष्ण की गोचारण-स्थली है यह । अपने ग्वाल-बाल सखाओं सहित गाय चराते, परस्पर हास विनोद करते, श्रीकृष्ण तथा बलराम इस एकान्तिक स्थली में चले आते हैं। ग्रीष्म की दोपहरी में सघन वृक्षावली की छाया का आनन्द लेते हुए गोप-बालक, परम आनन्द को प्राप्त करते हैं । स्थान : लोहवन मथुरा-गोकुल राजमार्ग से मथुरा से लगभग 3 km उत्तर पूर्व में यमुना के पार स्थित है ।