
मथुरा
मथुरा श्री कृष्ण की जन्मभूमि है । यहाँ श्री कृष्ण की अनेक लीलाएं हुई हैं । भारत की प्रख्यात मोक्ष प्रदायिनी, परम पावन प्राचीनतम सप्त पुरियों में श्री कृष्ण की जन्मभूमि श्रेष्ठ, श्री मथुरा जी की गणना, श्लोक के प्रथम पाद में ही हो जाती है - अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका । पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका ॥ - पद्म पुराण धरती पर सात पुरी हैं, अयोध्यापुरी, मथुरापुरी, मायापुरी (हरिद्वार), काशीपुरी (वाराणसी), काञ्चीपुरी, अवंतिकापुरी (उज्जैन), द्वारावतीपुरी (द्वारिका), जो मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं । अहो मधुपुरी धन्या बैकुण्ठाच्च गरीयसी । दिनमेकं निवासेन हरौ भक्ति प्रजायते ॥ - पद्म पुराण श्री मथुरा में मात्र एक दिवस के वास से पंचम पुरुषार्थ "कृष्ण प्रेम" का हृदय में प्रस्फुटन होने लगता है फिर अपर लाभों से क्या प्रयोजन? सतयुग के अन्त में मधु नामक दैत्य सभी असुरों को जीतकर त्रिलोकपति बन गया था । मधु के निवास काल में उस स्थान का नाम मधुपुरी पड़ा । दुरात्मा के अत्याचारों से भयाक्रान्त हो समस्त देवतागण प्रभु की शरण में आये । 10 वर्ष प्रभु के साथ मधु का संग्राम चला, अन्त में मधु का प्राणान्त हो गया । तत्पश्चात् देवों ने प्रभु की वन्दना की और प्रभु को नूतन नाम से संबोधित किया- 'माधव' और मधुपुरी का नाम रखा 'मथुरा' । उसी समय देवों द्वारा 84 तीर्थ यहाँ स्थापित हुए । विष्णु पुराण के अनुसार त्रेतायुग में शत्रुघ्न ने मधु पुत्र लवणासुर का वध करके मधुवन का सघन कानन काटकर मथुरा नगरी की स्थापना की - हत्वा च लवणं रक्षो मधुपुत्रं महाबलम् । शत्रुघ्नो मधुरां नाम पुरीं यत्र चकार वै ॥ - विष्णु पुराण (1.12.04) इसके अलावा भागवत में भी शुकदेव जी ने वर्णन किया है- शत्रुघ्नश्च मघोः पुत्रं लवणं नाम राक्षसम् । हत्वा मधुवने चक्रे मथुरां नाम वै पुरीम् ॥ - श्रीमद्भागवत (9.11.14) शत्रुघ्न जी ने मधुवन में मधु के पुत्र लवण नामक राक्षस को मारकर वहाँ मथुरा नाम की पुरी बसायी । वाराह उवाच विंशतिर्योजनानां हि माथुरं मम मंडलम् । पदे पदेऽश्वमेधानां फलं नात्र विचारणा ॥ - आदि वराह पुराण (168.9) स्वयं वाराह भगवान् ने कहा – (पृथ्वी से) "मेरा माथुर मण्डल विंशति (20) योजन विस्तृत है अर्थात् 80 कोस, बड़ा व्यापक क्षेत्र है ।" विंशतिर्योजनानां तु माथुरं मम मंडलम् । यत्र तत्र नरः स्नातो, मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ - आदि वराह पुराण (158.1) “मेरे इस 20 योजन मथुरा में पद-पद पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है और स्नान से समस्त पापों से निवृत्ति हो जाती है ।” "स्वयं हि मथुरानाथः केशव क्लेशनाशनः " - गर्ग संहिता "स्वयं क्लेश नाशक केशवदेव ही मथुरा के नाथ हैं, जिन्हें वाराह देव के नाम से भी पुकारते हैं । स्वयं भगवान् ने अपनी केशव देव जी की मूर्ति सर्वप्रथम कपिलदेव ब्राह्मण को प्रदान की - इसके पश्चात् तो यह भ्रमणशील रही, कपिलदेव से इन्द्र के पास, इन्द्र से रावण, रावण से श्रीराम प्रभु इसे अयोध्या लाये और राम जी की वन्दना करके उनसे शत्रुघ्न जी उस श्री केशव वाराह प्रभु के विग्रह को लाये, जिसकी मथुरा में स्थापना की, वे ही साक्षात् कपिल वाराह मथुरा के श्रेष्ठ मंत्री हैं । मथुरा के रक्षक हैं - भूतेश्वर महादेव, जिन्हें मथुरा के कोतवाल के रूप में देखा जाता है । इसका पुष्ट प्रमाण 'गर्गसंहिता', 'आदिवाराह पुराण' आदि ग्रंथों में मिलता है - क्षत्ता श्री मथुरायाश्च नाम्ना भूतेश्वरः शिवः । दत्त्वा दण्डं पातकिने भक्त्यर्थान्मंत्रतां व्रजत् ॥ - गर्ग संहिता मथुरा के क्षेत्रपाल श्री भूतेश्वर, पापियों को दण्ड देकर भक्ति के लिए उन्हें मन्त्र देते हैं ।
