
परासौली
परासौली श्री कृष्ण और उनकी प्रियतमा गोपियों के वसंत रास लीला का स्थान है । यह रास ब्रह्मा जी की पूरी रात्रि तक चलती रही, लेकिन कुछ ही क्षणों में यह समाप्त हो गयी । इस रास लीला को देखकर आकाश में चन्द्र अचंभित हो गए थे, और पूरी रात्रि एक ही स्थान पर रहे । चूँकि यह रास लीला पूर्णिमा के प्रकाश में हुआ था, इसलिए इस स्थान को चंद्र-सरोवर भी कहा जाता है। सरोवर के दक्षिण-पश्चिमी कोने में श्रृंगार मंदिर है, जहां श्री कृष्ण ने श्री राधा का अपने कर-कमलों से श्रृंगार किया था । सरोवर के पास ही चोंकर वृक्ष के नीचे श्री वल्लभाचार्य जी की बैठक है । सूरदास जी की कुटी और समाधि, जिसे सूर-कुटी और सूर-समाधि के नाम से जाना जाता है, इसी क्षेत्र में हैं । सूरदास जी जन्मजात कवि थे । इनकी पदावलियों का संग्रह "सूर सागर" के नाम से प्रसिद्ध है । सूरदासजी अन्धे होते हुए भी श्रीनाथजीका जैसा श्रृंगार होता, ठीक वैसे ही पदकी रचना कर उसका सरस वर्णन करते थे । एकदिन पुजारीजीने श्रीनाथजीको बिल्कुल नंगे रखकर मन्दिरके पट खोल दिये एवं सूरदासको उनके श्रृंगारका वर्णन करने को कहा । सूरदास जी कुछ क्षण तक मौन खड़े रहे । किन्तु पुजारीजीके बार - बार पूछनेपर सूरदासजी बड़े जोरसे हँसे, और यह पद गाना आरम्भ किया - "आज भये हरि नंगम नंगा "। सूरदासका यह पद सुनकर सभी लोग स्तब्ध हो गये । अपने अन्तिम दिनोंमें वे परासौली में ही थे। श्रीगोसांई विट्ठलनाथ जी ने पूछा - सूर! तुम क्या चिन्ता कर रहे हो ? सूरदास जी ने अन्तिम पदावलीके रूपमें गाते-गाते अपने प्राणोंको छोड़ दिया - "खंजन नैन रूप रस माते, अतिशय चारु चपल अनियारे पल पिंजरा न समाते " गोसाईजीने अश्रुपूरित नेत्रोंसे कहा - आज पुष्टिमार्गका जहाज चला गया । परासौली के अग्निकोण में संकर्षण कुण्ड है, उसके तटके ऊपर श्री बलदेव जी का मन्दिर है । स्थान : परासौली गाँव गोवर्धन नगर से लगभग 2 km दक्षिण-पूर्व में गोवर्धन की तलहटी में स्थित है ।
