रावल

रावल

"रावल" शब्द का अर्थ है "एक प्रभावशाली जमींदार"। इस स्थान का नाम श्री वृषभानु महाराज के नाम पर रखा गया है, जो सबसे प्रभावशाली जमींदार थे । श्वेत वाराहकल्प की अट्ठाइसवीं चतुर्युगी में श्रीकृष्ण ने अवतार ग्रहण किया । श्रीराधा उसमें सहर्ष योग देती हैं तथा किसी भी कारण को समक्ष रख भूतल पर अवतरित होने की भूमिका बन जाती है । श्रीकृष्ण तथा उनका परिकर; किशोरी श्रीराधा तथा उनकी सखी वृन्द, सभी अपने निज जनों को लीला का सुख देने के लिए ब्रज में अवतरित होते हैं । राजा सुचन्द्र ब्रह्माजी से वर प्राप्त कर ब्रज में वृषभानु गोप के नाम से प्रकट हुए और उनकी पत्नी कलावती, कीर्त्तिदा गोपी के रूप में वृषभानुपुर की शोभा बढ़ाने लगीं । इन्हीं महाभागा कीर्त्तिदा रानी को श्रीराधा की जननी होने का महासौभाग्य प्राप्त हुआ । ब्रह्म मुहूर्त आ गया । यमुनातटवर्ती निकुञ्ज में दिव्योन्मादी वातावरण में किशोरी श्रीराधा ने अवतार ग्रहण किया । चारों ओर हर्ष की अपार लहर दौड़ गई । गोपियों तथा गोपों के हर्ष का पारावार न रहा । पुरवासी उतावले होकर इस शुभ समाचार को एक दूसरे को सुनाने के लिए भागे-भागे गये । चारों ओर मंगलवाद्य बजने लगे, गीत गाये जाने लगे - महारास पूरन प्रकट्यो आनि । अति फूली घर-घर ब्रज नारी राधा प्रकटी जानी ॥ अहा ! श्रीराधा के प्राकट्य की बात सुनकर ब्रजाङ्गनाऐं हर्षोल्लास में भर गई और जय जयकार करने लगीं । आज रावल में जय-जयकार । प्रकट भई वृषभानु गोप के श्रीराधा अवतार ॥ गृह गृह ते सब चलीं वेग दै गावत मंगलचार । प्रकट भई त्रिभुवन की सीमा रूप राशि सुख सार ॥ निरतत गावत करत बधाई, भीर भई अति, द्वार । ‘परमानन्द’ वृषभानु नन्दिनी जोरी नन्द-दुलार ॥ यह श्रीराधा की प्राकट्यस्थली 'रावल' नाम से विख्यात है । आज भी यमुना तट पर एक मन्दिर अपने इतिहास की पताका फहरा रहा है । अपनी ननसाल में श्रीराधा का प्राकट्य हुआ, पुनः वे श्रीवृषभानुपुर पधारीं । श्री वृषभानुनन्दिनी के भूतल पर प्राकट्य सम्बन्धी एक और सरस गाथा अनेक वैष्णव महानुभावों तथा गोस्वामी गण की अनुभूतियों के आधार पर चली आ रही है । वृषभानुपुर में श्रीजी के महल में इसी परिपाटी तथा परम्परा के आधार पर प्राकट्य दिवस मनाया जाता है । श्रीवृषभानु बाबा भाद्रमास की अष्टमी के दिन नित्य की भाँति ‘वृषभानुसरोवर’ पर पधारे । वहीं एक सघन कुञ्ज की झुकी वृक्षावलि के पास ही एक बालिका कमल के फूल में सुशोभित, सरोवर में तैरती हुई बाबा की दृष्टि अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं । वे श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीराधा ही थीं । कल्पान्त भेद से इस बात की सत्यता में भी कोई आशंका नहीं है । स्थान : रावल मथुरा से 5 km पूर्व में स्थित है।