ब्रज विलास स्तव - रघुनाथ दास गोस्वामी
ओ! जब मैं ब्रज में गोवर्धन के ढलानों के चारों ओर घूमता हूं तो पागलपन मैं बार-बार पुकारता हूं, "हे राधे! हे कृष्ण! ", और जब कभी गोवेर्धन पर्वत पे ठोकरें खाकर और कभी-कभी जमीन पर बेहोश हो जाता हु तो मेरी आँखों के आंसुओं लगातार बाह जाते है
