श्री लक्षदास जी

श्री लक्षदास जी वृंदावन शुक सम्प्रदाय के एक रसिक संत हैं जो श्री चरण दास जी के शिष्य श्री आत्माराम जी के शिष्य थे।

7 लेख उपलब्ध हैं

  1. ते मोहै प्रिया कुंजबिहारी - श्री लक्षदास (शुक सम्प्रदाय के भक्त)

    हमारी प्रियाजी (श्री राधा) श्री कुंजबिहारी को सदा मोहित करने हैं। वृषभानुनंदिनी श्री राधा महाचतुर शिरोमणि हैं, जो रूप से अति उज्जवल हैं ।

  2. प्यारी के वारने जाऊँ भान दुलारी के - श्री लक्षदास (शुक सम्प्रदाय के भक्त)

    श्री वृषभानु दुलारी, श्री राधा महारानी की बलिहारी जाता हूँ जिनका ध्यान श्री कृष्ण चंद्र भी सदा करते हैं, जिनका रूप परम उज्जवल है ।

  3. बाँकौ धाम नाम वृन्दावन, बाँके ब्रज के बासी - श्री लक्षदास (शुक सम्प्रदाय के भक्त)

    श्री धाम वृंदावन बांका है और ब्रज के सब वासी भी बांके हैं । श्री वृंदावन के इष्ट श्री बांके बिहारी भी बांके हैं और सब संत उपासक भी बांके हैं ।

  4. लड़ैती मेरी ओर निहार - श्री लक्षदास (शुक सम्प्रदाय के भक्त)

    श्री कृष्ण कहते हैं, हे लड़ैती जू [श्री राधिका]! कृपया मुझपर अपनी कृपा दृष्टि कीजिये । आप गुणों की एवं सुख की सागर हो, कृपया मेरी विनती सुनें ।

  5. कर दरस ना अघाऊं, बास वृन्दावन पाऊं - श्री लक्षदास (शुक सम्प्रदाय के भक्त)

    मेरा उत्तम भाग्य यही होगा कि मैं आपके दर्शन कर कभी न अघाऊं, श्री वृन्दावन का अखंड वास प्राप्त करूं एवं आपकी सेवा कर उत्साहित रहूं।

  6. जो हो कृपा बिहारिन की तो, वृन्दावन रस चाखै - लक्षदासजी महाराज

    जिसपर नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधारानी की कृपा होती है, वही श्री वृन्दावन के दिव्य रस का आस्वादन कर पाता है। वह यमुना तट एवं बंशीवट में वास करता है और नित्य श्री राधा कृष्ण का गुणगान करता है।