प्यारी जू जब जब देखौं तेरो मुख - स्वामी हरिदास, केलीमाल (34)

प्यारी जू जब जब देखौं तेरो मुख - स्वामी हरिदास, केलीमाल (34)

(राग केदारौ)
प्यारी जू जब जब देखौं तेरो मुख तब तब नयों नयों लागत।
ऐसौ भ्रम होत मैं कहूँ देखि न री दुति कौं दुति लेखनी न कागत॥ [1]
कोटि चन्द्र तैं कहाँ दुराये री नये नये रागत।
श्री हरिदास के स्वामी स्याम कहत काम की सांति
न होई न होई तृप्ति रहौं निसी दिन जागत॥ [2]

- स्वामी हरिदास, केलीमाल (34)

श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं— हे प्यारी जू! जब भी मैं तुम्हारे मुख-कमल को देखता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हें पहली बार देख रहा हूँ। ऐसा भ्रम हो जाता है मानो मैंने ऐसी सुन्दरता पहले कभी देखी ही न हो। ऐसी सुन्दर एवं दिव्य छवि की शोभा का वर्णन करने के लिए न तो कोई कलम है और न ही कोई कागज है। [1]

हे प्यारी जू! तुम करोड़ों दीप्तिमान चन्द्रमाओं की कान्ति को अपने भीतर कैसे छिपा लेती हो, जिसकी नवीन माधुरी का पान कर मैं नित्य मोहित होता रहता हूँ। श्री हरिदास के स्वामी श्री श्यामसुन्दर कहते हैं— “मेरी यह इच्छा कभी कम न हो, मुझे कभी तृप्ति न मिले और मैं रात-दिन तुम्हारी रूप-माधुरी के रस में छककर जागता रहूँ।” [2]