एक समय रासलीला करते हुए श्री कृष्ण रासलीला से अंतर्ध्यान हो गए। श्री कृष्ण के लीला में न होने से गोपियाँ दुखी हो गईं और दुःख से पीड़ित गोपियाँ श्री कृष्ण को हर स्थान पर ढूंढ़ने लग गईं। श्री कृष्ण ने चतुर्भुज रूप धारण कर लिया। परन्तु जब गोपियों ने श्री कृष्ण का चतुर्भुज रूप देखा और औपचारिकता दिखाते हुए अपने मार्ग की तरफ बढ़ गईं क्योंकि उन्हें श्री कृष्ण के माधुर्य रूप से ही प्रेम है। श्री राधा रानी, श्री कृष्ण के न होने पर व्याकुल थीं और ढूंढते हुए श्री कृष्ण के पास आ पहुंची, श्री राधा रानी के आने पर श्री कृष्ण अपने चतुर्भुज रूप में नहीं रह पाए और अपनी दोनों भुजाओ को समेट ली (अपने वास्तविक रूप में आ गए)। श्री कृष्ण श्री राधा रानी को देख कर अपने असली स्वरुप जो की सदा ही मुस्कान से युक्त, नित्य किशोर, ग्वाले, नृत्यक, बंशीधर रूप धारण कर लिया |
श्री कृष्ण ने श्री राधा रानी से क्षमा मांगी और कहा " प्यारीजु, जब मैंने आपको रास में नहीं देखा और आप मुझसे अलग होने से बहुत दुखी हो गईं तो मै आपको ढूंढ़ने लग गया | मैं यह रास लीला केवल आपके लिए ही कर रहा था, आपको मान लीला नहीं रचाना था, आप मुझसे कभी विलग न होना"। श्री कृष्ण के अनेक प्रिय भक्त हैं, लेकिन स्वयं श्री कृष्ण श्री राधा रानी की नित्य दासता चाहते हैं क्योंकि वह "मादन रस" वारी हैं, जो श्री कृष्ण को भी प्राप्त नहीं हैं।
स्थान:
पैठ गाँव परासौली गाँव के दो मील की दूरी पर स्थित है।

