भक्तमाल में नाभा जी द्वारा लिखित:
यात्रा काल में जहाँ भी शंकराचार्य विराजते थे, उनके शिष्य उसके पूर्व उतना भूमि भाग खोद उसको लीपते थे, उसे जल से सिंचित करते थे रस शुद्धि के लिए, परंतु जब वह ब्रज की ओर बढे तो आचार्य ने भूमि खनन से निषेध कर दिया। शिष्य समाज संदेह करने लगे कि गुरुदेव को क्या हो गया? तत्काल वो भूमि पर आसीन हो गए और ब्रज की रज में लोटपोट होने लगे और बोले की अब जल सिंचन की आवश्यकता नहीं।
शिष्य जन पूछते हैं की प्रभु आपको क्या हो गया तो उत्तर में बहुत सुन्दर गोविन्दाष्टक गाया|
“गोष्टप्रांगण रिंगनलोलं मनअनायासं परमयसम,
वृंदावनभुिव वृंदारकगणवृदारायं वंदेह || ”
यह साधारण मिट्टी नहीं है। यह वृंदावन की रज है, जिसकी आकांक्षा देवता भी करते हैं।
यात्रा काल में जहाँ भी शंकराचार्य विराजते थे, उनके शिष्य उसके पूर्व उतना भूमि भाग खोद उसको लीपते थे, उसे जल से सिंचित करते थे रस शुद्धि के लिए, परंतु जब वह ब्रज की ओर बढे तो आचार्य ने भूमि खनन से निषेध कर दिया। शिष्य समाज संदेह करने लगे कि गुरुदेव को क्या हो गया? तत्काल वो भूमि पर आसीन हो गए और ब्रज की रज में लोटपोट होने लगे और बोले की अब जल सिंचन की आवश्यकता नहीं।
शिष्य जन पूछते हैं की प्रभु आपको क्या हो गया तो उत्तर में बहुत सुन्दर गोविन्दाष्टक गाया|
“गोष्टप्रांगण रिंगनलोलं मनअनायासं परमयसम,
वृंदावनभुिव वृंदारकगणवृदारायं वंदेह || ”
यह साधारण मिट्टी नहीं है। यह वृंदावन की रज है, जिसकी आकांक्षा देवता भी करते हैं।

