एक दिन श्री रघुनाथ दास गोस्वामी राधा कुंड पर खुले आकाश के नीचे ध्यान लगाकर भजन कर रहे थे। सूर्य देव तीव्र गर्मी बरसा रहे थे। उनके शरीर से बहुत पसीना निकल रहा था और पसीने की वजह से उनके कपडे भीग गए थे। अत्यधिक पसीने के कारन धरती पर कीचड हो गया। उनके मुख से कभी-कभी हे राधे! हे राधे! शब्द निकल रहे थे। उसी समय श्री सनातन गोस्वामी उनके निकट आ रहे थे, श्री सनातन गोस्वामी जी देखते है कि रघुनाथ जी भजन में लीन है और श्री राधा रानी अपने आँचल से उनके सिर पर छाया करके खड़ी हैं। राधा रानी को सनातन ने देखा, वे मुस्कुराईं और अचानक अंतर्ध्यान हो गईं ।
श्री सनातम गोस्वामी श्री दास गोस्वामी जी के निकट आये और उन्हें ध्यान से जगाया और उन्हें बताया की जब आप ध्यान में मग्न थे उसी क्षण राधा रानी आपकी सेवा कर रही थीं और अपने आँचल से आपको धूप से बचा कर स्वयं धूप में खड़ी थीं । रघुनाथ दास जी को विश्वास नहीं हुआ | अविश्वास में रघुनाथ दास ने चारों ओर दृष्टि घुमाई और श्री राधा रानी के चरण चिन्ह देख कर विकल हो उठे, भूमि पर भावावस्था में लोटने लगे । भूमि पर आगे और पीछे राधा रानी को ढूंढते हुए रघुनाथ दास ने एक छोटे बच्चे की भांति रोना शुरू कर दिया। सनातन गोस्वामी ने कुछ भक्तों की सहायता से रघुनाथ दास को सांत्वना दी और एक छोटी सी कुटिया बना दी जिससे रघुनाथ जी इसके अंदर भजन कर सकें । चैतन्य चरितामृत के कुछ हिस्सों में यह पाया गया कि रघुनाथ दास गोस्वामी दिन में 22 घंटे से अधिक समय तक भजन करते थे और 2 घंटे से भी कम सोते थे।

