राधारानी की सनातन गोस्वामी पर कितनी कृपा थी यह एक और घटना से प्रकट होती है। श्रीरूप गोस्वामी ने 'चाटुपुष्पाञ्जलि' की रचना की। उसका प्रथम श्लोक देखकर सनातन गोस्वामी को कुछ संदेह हुआ। श्लोक इस प्रकार है-
नवगौरोचना गौरी प्रवरेन्दीवराम्बरां।
मणि स्तव कविद्योतिवेणी व्यालांगनाफणां॥[10]
"सनातन गोस्वामी को लगा कि श्लोक में राधारानी की वेणी की तुलना नागिन से करना ठीक नहीं। महाभावमय राधारानी के केश भी सच्चिदानन्द-स्वरूप और महाभावमय हैं। उनकी तुलना नागिन से करना अमृत की तुलना विषसे करना जैसा है। उसी दिन मधुकरी-भिक्षा से लौटते समय उन्होंने देखा कि राधा कुंड के किनारे एक वृक्षपर झूला पड़ा है। उस पर आकाश में चंचल विद्युत के समान एक बालिका झूल रही है, सखियां झूला रही हैं। सहसा उसकी पीठ की ओर देखकर वे चीख पड़े-"लाली सांप, सांप, तेरी पीठ पर।"
इतना कह वे सांप को हटाने के लिए जैसे ही बालिका की ओर दौड़े बालिका उन्हें देखकर मुसकाई और सखियों सहित अन्तर्धान हो गयी। सनातन गोस्वामी समझ गये कि बालिका स्वयं राधारानी ही थीं। उन्होंने उन्हें यह अनुभव कराने को दर्शन दिये थे कि रूप गोस्वामी ने उनकी चोटी की उपमा नागिन से ठीक ही दिया है । सांप की तरह लफलफाती उनकी वेणी का दृश्य वे भूल नहीं पा रहे थे। उसमें जैसा आकर्षण था। उसे देख उन्हें बोध हो रहा था कि निश्चय ही उसे देख रसिकशेखर श्यामसुन्दर के मन में उनसे मिलने की व्याकुलता उन्हें विषधर सर्प के दर्शन का सा अनुभव कराती होगी।
उसी समय वे रूप गोस्वामी के पास आये । उनकी परिक्रमा और उनके चरणों की वन्दनाकर अपनी भूल स्वीकार करते हुए बोले-"रूप, तुम धन्य हो। राधारानी की तुम पर बड़ी कृपा है। तुम्हारे काव्य में कल्पनाका लेश भी नहीं है। तुम जो देखते हो उसी का वर्णन करते हो।"

