एक दिन श्री रूप गोस्वामी सनातन गोस्वामी के लिए कुछ मीठे चावल बनाना चाहते थे परन्तु उनकी कुटिया में मीठे चावल बनाने के लिए आवश्यक वस्तुऐं नहीं था । श्री राधारानी, जो कि सभी भक्तो के मन को जानतीं हैं, उनको इस विषय के बारे में ज्ञात हुआ | इसलिए एक किशोर गोपी के कपड़े पहनकर वह रूप गोस्वामी के लिए दूध, चावल और चीनी ले आयीं और कहा, "स्वामी जी! स्वामी जी! मैं आपके लिए उपहार में कच्चे चावल लेकर आयी हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।" उस किशोरी के शब्द सुनकर श्री रूप गोस्वामी ने अपनी कुटिया का दरवाजा खोला और बाहर देखा। वहां उन्होंने एक सुन्दर किशोर लड़की को खाने का कुछ सामान लिए हुऐ देखा। रूप गोस्वामी ने कहा, "तुम यहाँ क्यों आयी हो?" " स्वामी जी! मैं सिर्फ आपके लिए ये कच्चे चावल लाई हूँ। "तुमने मेरे लिए इतना कष्ट क्यों किया?" बाबा! इसमें कष्ट क्या! मैं यहाँ केवल एक संत को विनम्र सेवा प्रदान करने आयी हूँ।" दूध, चीनी और कच्चे चावलों को स्वीकार करते हुऐ रूप गोस्वामी ने कहा की," जब तक मैं इन वस्तुओं को अंदर रख आऊं, तब तक तुम यहाँ बैठो।" किशोरी ने कहा," मुझे क्षमा कीजिये! मुझे कुछ काम करना है।" यह कहकर किशोरी अन्तर्ध्यान हो गयी। जब रूप गोस्वामी मुड़े तो वे ये सब देखकर आश्चर्यचकित रह गये की वह जा चुकी थी। थोड़ी देर बाद उन्होंने मीठे चावल बनाये और अपने आराध्य गोविंद देव को भोग लगाया। कुछ समय बाद उन्होंने सनातन गोस्वामी जो कि अभी-अभी पहुंचे थे, उन्हें प्रसाद दिया।
प्रसाद लेते हुऐ सनातन गोस्वामी ने एक असामान्य और मोहक प्रसन्नता अनुभव की। उन्होंने श्री रूप से पूछा," तुम्हे यह दूध और चावल कहाँ से मिले?" रूप गोस्वामी ने कहा," एक किशोर गोपी लड़की यहाँ आयी और मुझे ये सब दिया"। सनातन ने कहा,"एक किशोरी लड़की एकदम से यहाँ आयी और तुम्हे दूध और चावल दिए!" रूप गोस्वामी ने उत्तर दिया," हाँ वह एकदम अचानक से आयी। विचित्र बात तो ये है की मैं सोच रहा था की सनातन के लिए मीठे चावल कैसे बना सकता हूँ। और तभी वह जादू की तरह दूध, चावल और चीनी के साथ प्रकट हो गयी।" ये सब सुनकर सनातन गोस्वामी की आँखों से प्रेम के अश्रु गिर पड़े। उन्होंने कहा," जब वह तुम्हारी आँखों के सामने थी तो तुमने कुछ पता नहीं किया?" वे स्वयं श्री राधा ठकुरानी थी जो दूध और चावल लेकर आयी थी। उनकी सेवा लेकर हमने अच्छा नहीं किया। अब हम कभी भी अपने वांछित लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाएंगे" और इस प्रकार सनातन गोस्वामी बड़े ही विनम्र भाव से बार-बार अपने आप को कोसते रहे की उन्होंने उनकी सेवा ली जिनकी केवल सेवा का लक्ष्य ही लेकर वह आये हैं।
यह कथा भक्ति रत्नाकर में वर्णित है।

