एक दिन श्री राधा कृष्ण की लीलाओं में विप्रलम्भ भाव के विषय में चर्चा करते हुए सभी भक्त रोने लगे और मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। रूप गोस्वामी का हृदय अग्नि की भांति धधक रहा था। फिर भी उन्होंने इस तथ्य को उजागर नहीं किया। रूप गोस्वामी ने कभी भी अपने सात्विक भाव का प्रदर्शन नहीं किया और वह हमेशा इसे नियंत्रित करते थे। वह हमेशा चर्चा करते थे कि एक भक्त को हमेशा अपने भाव को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। रूप गोस्वामी ने जब स्वास ली तो वह इतनी गरम थी की एक भक्त को स्पर्श होते ही उसके शरीर पर फफोले हो गये। यह देखकर सब आश्चर्यचकित हो गए। यह घटना भक्ति रतनाकर में वर्णित है।

भक्त रूप गोस्वामी के भाव भक्तों द्वारा देखा गया है।
एक दिन श्री राधा कृष्ण की लीलाओं में विप्रलम्भ भाव के विषय में चर्चा करते हुए सभी भक्त रोने लगे और मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। रूप गोस्वामी का हृदय अग्नि की भांति धधक रहा था। फिर भी उन्होंने इस तथ्य को उजागर नहीं किया। रूप गोस्वामी ने कभी भी अपने सात्विक भाव का प्रदर्शन नहीं किया और वह हमेशा इसे नियंत्रित करते थे। वह हमेशा चर्चा करते थे कि एक भक्त को हमेशा अपने भाव को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। रूप गोस्वामी ने जब स्वास ली तो वह इतनी गरम थी की एक भक्त को स्पर्श होते ही उसके शरीर पर फफोले हो गये। यह देखकर सब आश्चर्यचकित हो गए। यह घटना भक्ति रतनाकर में वर्णित है।
