गोपियों का मधुर भाव और श्री कृष्ण के लिए उनका निस्वार्थ दिव्य प्रेम सार्वभौमिक रूप से जाना जाता है। एक बार द्वारका की रानियों के मन में एक संदेह उत्पन्न हुआ। रानियाँ आश्चर्यचकित थीं कि भले ही वे सभी बेहद सुंदर, सभ्य और प्रतिभाशाली हैं लेकिन उनके पति श्री कृष्ण प्रायः ब्रज की गोपीयों को याद करते हैं और नित्य “श्री राधा राधा” रटते हैं चाहे वो सो रहे हों या जाग रहे हों | वो द्वारका में अपनी 16,108 पत्नियों के सभी गुणों को भी भूल गए।
ब्रज की गोपियों को आकर्षक और प्यारा बनाने वाले ऐसे कौनसे गुण थे ? अपनी रानी के मन में इस संदेह को दूर करने के लिए श्री कृष्ण ने एक लीला का प्रदर्शन किया। श्री कृष्ण शैय्या पर लेट गए। झूठे ही कहा कि उनके सिर में दर्द हो रहा है । रानियाँ चिंतित हो गईं । उन्होंने कई उपचारों की कोशिश की लेकिन कुछ भी काम नहीं कर रहा था।
उसी समय नारद जी भी वहां पधारे और भगवान की दशा को देख कर चिंतित हो गए। उन्होंने श्री कृष्ण से पूछा, "प्रिय भगवन! आप हमें क्यों नहीं बताते कि आपका कष्ट कैसे ठीक हो सकता है? श्री कृष्ण ने उत्तर दिया, "यदि मैं भगवत-प्राप्त आत्मा के चरण रज प्राप्त कर अपने मस्तक पे लगा लूंगा तो मेरा सिरदर्द ठीक हो जाएगा।" नारदजी ने सोचा कि उन्हें यह काम करने के लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं है। सभी रानियां भगवत-प्राप्त थीं और वह श्री कृष्ण के माथे पर रगड़ने के लिए बस अपनी चरणों की धूल का उपयोग कर सकती थीं।
जब नारदजी ने रानियों से उनके चरण रज के लिए कहा तो उन सभी ने स्वाभाविक रूप से मना कर दिया। उन्होंने विद्रोह किया, "हम अपने पति के माथे पर रगड़ने के लिए अपनी चरणों की धूल कैसे दे सकती हैं, क्या हमें नर्क जाना है?"
बार-बार आग्रह करने के बाद भी, रानियों में से कोई भी अपने चरणों की धूल देने के लिए सहमत नहीं हुई। अंत में नारदजी हार कर श्री कृष्ण के पास वापस आये और पूछा, "प्रिय भगवान, आप हमें क्यों नहीं बताते कि भगवत-प्राप्त के चरणों की धूल की व्यवस्था कैसे करें?" जिस पर श्री कृष्ण ने उत्तर दिया, "नारद, आप इसे यहां प्राप्त नहीं कर सकते, आप ब्रज में जाएँ और गोपियों से इसके लिए विनती करें ।"
जब नारदजी ब्रज पहुंचे और गोपीयों को पूरी स्थिति को समझाया, तो उसी क्षण गोपियों ने अपने चरण आगे कर दिए और कहा "नारद जी, जितना संभव हो उतना चरणों की धूल ले लीजिये।"
नारदजी चौंक गए और गोपियों से पूछा "क्या आप सब जानतीं हैं कि किसके सिर पर इन चरणों की धूल को लगाई जाएगी और ऐसा करने के क्या परिणाम होंगे? आप सबको नर्क की प्राप्ति होगी!"
गोपियों ने उत्तर दिया, "नारदजी, हम समझतीं हैं कि हमें नर्क में निवास प्राप्त होगा, इससे अधिक तो कुछ भी नहीं होगा न ? हमें इस विषय की कुछ भी परवाह नहीं है। हम नर्क के लिए अनगिनत बार जाते हैं। और यदि इस समय हमें अपने प्रियतम के सुख के लिए नर्क निवास मिले, तो हमें कोटि-कोटि जन्म के लिए भी नर्क निवास स्वीकार है"
हमारे प्राणो से भी प्रिय श्री कृष्ण को हमारे चरण रज से कष्ट से मुक्ति मिलेगी । इससे अलावा कुछ भी हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं है, हमें इस बात की चिंता नहीं है कि हमें बदले में क्या मिलता है। जब द्वारका की रानियों ने गोपी के इस व्यवहार के बारे में सुना तो वे बेहद आश्चर्यचकित हो गयीं ।
गोपी के प्रेम से बाध्य होकर सर्वोच्च भगवान श्री कृष्ण भी अपनी अलंकृतता खो देते हैं। वह स्वेच्छा से गोपी के घरों में जातें हैं जिससे वह "माखन चोर" सब्द सुन सकें। वह हमेशा गालियाँ (डांट) को सुनने के लिए उत्सुक रहतें हैं ।

