जब श्री बिहारिन जी यमुना के किनारे में दंग रह गए थे।

जब श्री बिहारिन जी यमुना के किनारे में दंग रह गए थे।


श्री विठ्ठलविपुल देव जी के निकुंज गमन के पश्चात् श्री बिहारीन देव जी गद्दी पर विराजमान हुए । अर्थात श्री विठ्ठलविपुल देव जी के निकुंज गमन के पश्चात् बांके बिहारी जी की सेवा श्रीबिहारीन देव जी ने स्वीकार कीया । उन्होंने श्री बांके बिहारी जी की सेवा बहुत उत्साह के साथ की। उनके जीवन से संबंधित एक घटना बहुत प्रसिद्ध है। एक बार, श्रीबिहारीन देव जी यमुना में स्नान करने के लिए जा रहे थे, उनके मुंह में दातुन था (दांत साफ करने की वस्तु)। उन्होंने यमुना जी के तट पर श्री राधा रानी को रास लीला करते हुए देखा और वो उस रास लीला में इतने लीन हो गए की तीन दिन  बीत गए और वे वहीं खड़े रहे। जब श्री सनातन जी ने इस बारे में सुना, तो श्री सनातन जी ने उन्हें मदन मोहनजी का प्रसाद भेजते हुए कहा कि यह श्री बिहारी जी का प्रसाद है। जब उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया तब श्री बिहारीन देव जी युगल चेतना से बहार आये। वे प्रायः नित्य विहार, निकुंज लीला के भाव में डूबे रहते थे। जैसे कहा जाता है की "मधुर रस, ब्रज रस, वृंदावन के सभी रसों में सर्वोच्च रस है"|