रूप गोस्वामी वृंदावन में रहते थे। एक बार रूप गोस्वामी ने "ललित माधव" नाटक लिखने के बाद राधा कुंड आये जहां रघुनाथ दास जी रहते थे। रूप गोस्वामी ने ललित माधव रघुनाथ दास को दिया । यह पुस्तक विप्रलम्भ भाव में प्रेम की गहन भावनाओं का वर्णन करती है। पुस्तक पढ़ने के बाद रघुनाथ दास उदास हो गए और दिन-रात रोते रहे और दुःख से पागल हो गए। कभी-कभी वह पुस्तक छोड़कर, रहने के लिए दूर चले जाते और कभी-कभी वह पुस्तक को अपनी छाती पर रखकर जमीन पर लेट जाते। जिन लोगों ने रघुनाथ दास के परम आनंद के विभिन्न स्तिथि को देखा उन्होंने चेतना खो दी, वे आश्चर्य से चिंतित हो गए। रघुनाथ दास की दशा और उपचार के विषय में विचार करते हुए रूप गोस्वामी ने शीघ्र ही सम्पूर्ण "दान-केली-कौमुदी" लिख दिया। श्री रूप गोस्वामी ने तब रघुनाथ दास को नई पुस्तक दी और उनसे अनुरोध किया कि वे पुस्तक का अध्यन कर रस लें और संपादन के लिए ललित माधव को लौटा दें । यद्यपि रघुनाथ दास ललित माधव को छोड़ने के लिए अनिच्छुक थे, जब उन्होंने सुना कि रूप गोस्वामी इसे संपादित करना चाहते हैं तो रघुनाथ जी ने पुस्तक लौटा दिया । दान-केली-कौमुदी को लिया और पढ़कर उन्होंने विभिन्न उत्साहों का रस लिया और इस प्रकार सुख के सागर में विलीन हो गए।

जब श्री रूप गोस्वामी श्री रघुनाथ दास से भेंट की
रूप गोस्वामी वृंदावन में रहते थे। एक बार रूप गोस्वामी ने "ललित माधव" नाटक लिखने के बाद राधा कुंड आये जहां रघुनाथ दास जी रहते थे। रूप गोस्वामी ने ललित माधव रघुनाथ दास को दिया । यह पुस्तक विप्रलम्भ भाव में प्रेम की गहन भावनाओं का वर्णन करती है। पुस्तक पढ़ने के बाद रघुनाथ दास उदास हो गए और दिन-रात रोते रहे और दुःख से पागल हो गए। कभी-कभी वह पुस्तक छोड़कर, रहने के लिए दूर चले जाते और कभी-कभी वह पुस्तक को अपनी छाती पर रखकर जमीन पर लेट जाते। जिन लोगों ने रघुनाथ दास के परम आनंद के विभिन्न स्तिथि को देखा उन्होंने चेतना खो दी, वे आश्चर्य से चिंतित हो गए। रघुनाथ दास की दशा और उपचार के विषय में विचार करते हुए रूप गोस्वामी ने शीघ्र ही सम्पूर्ण "दान-केली-कौमुदी" लिख दिया। श्री रूप गोस्वामी ने तब रघुनाथ दास को नई पुस्तक दी और उनसे अनुरोध किया कि वे पुस्तक का अध्यन कर रस लें और संपादन के लिए ललित माधव को लौटा दें । यद्यपि रघुनाथ दास ललित माधव को छोड़ने के लिए अनिच्छुक थे, जब उन्होंने सुना कि रूप गोस्वामी इसे संपादित करना चाहते हैं तो रघुनाथ जी ने पुस्तक लौटा दिया । दान-केली-कौमुदी को लिया और पढ़कर उन्होंने विभिन्न उत्साहों का रस लिया और इस प्रकार सुख के सागर में विलीन हो गए।
