श्री राधावल्लभ मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले में वृन्दावन में स्थित है। यह बांके बिहारी मंदिर के पास है। "श्री राधावल्लभ दर्शन दुर्लभं" श्री राधावल्लभ के दर्शन बहुत दुर्लभ हैं। यह कहावत श्री राधावल्लभ मंदिर के बारे में बताने के लिए पर्याप्त है। श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी का जन्म एक गाँव में हुआ था । श्री राधा के दिए हुए निर्देशों के अनुसार उन्होंने श्रीधाम वृन्दावन के लिए प्रस्थान किया । वह भगवान श्री कृष्ण के बांसुरी के अवतार माने जाते हैं।
जब वह चार्तवाल गाँव पहुंचे, श्री जी ने उन्हें फिर से निर्देश दिया कि गाँव में एक ब्राह्मण की दो बेटियां है और आपको उनसे शास्त्रीय विधि के अनुसार विवाह करनी चाहिए। श्री राधा रानी ही केवल उनकी गुरु थीं । जब वे केवल छ: मास के थे, तो उनके मुख से श्री राधा सुधानिधि के श्लोक निरंतर प्रकट होते रहे अर्थात कम आयु में ही वे श्री राधा रानी के गीत गाया करते थे।
श्री राधावल्लभ इतिहास: आत्मदेव ब्राह्मण के पूर्वजों ने कैलाश पर्वत पर भगवान् शिव के लिए तपस्या की थी । भगवान शिव प्रसन्न हुए और अपनी इच्छा का आशीष पाने के लिए कहा । उन आत्मदेव ब्राह्मण के पूर्वजों पर बहुत अधिक जोर दिया अथार्त भगवान शिव से उन्हें अपनी इच्छा अनुसार वर मांगने के लिए कहा। जिसपर उन्होंने भगवान शिव की सबसे प्रिय वास्तु के लिए पूछा (उन्होंने भगवान शिव से पूछा की किस कार्य को करने में आपको अति रस की प्राप्ति होती है।
तब भगवान शिव ने उन्हें अपने हृदय से श्री राधावल्लभ जी महाराज की मूर्ति दी और उन्हें अपनी सेवा की विधि बताई। श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने इस विधि को अपनाया, और वृन्दावन आने पर यमुना के तट पर 'ऊँची ठौर' (हाई क्लिफ) (मदन टेर) पर स्थापित किया था। कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) के महीने के शुकल पक्ष की तेरह तारीख को श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी महाराज ने श्री राधावल्लभ जी की सेवा की शुरुआत की और उत्सव मनाया। श्री राधावल्लभ जी शुरू में मदन टेर पर विराजमान थे, फिर वे सेवा कुंज में चले गए। बाद में जब इस नए मंदिर का निर्माण हुआ, तब से यहाँ विराजमान हो गए। श्री राधावल्लभ लाल के संग श्री राधा का श्रीविग्रह नहीं है। लेकिन इसके बजाय वेदी पर एक मुकुट विराजमान है। जिसे श्री राधिका की पूजा की जाती है। इसके अलावा श्री राधावल्लभ श्रीविग्रह में श्री राधा और श्री कृष्ण, दोनों का युगल स्वरुप ही माना जाता है। श्री विग्रह की त्रिभंग मुद्रा, चंचल अरूण नयन , मन्द-मन्द मुस्कान, सुंदर श्याम स्वरुप, हर अंग मन को आकर्षित करती है। जब श्री कृष्ण मुरली बजाते हैं तो सभी गोपीयों को आकर्षित करते हैं। इसी तरह मुरली के अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के ही नियंत्रण में यह है, की युगल सरकार का मिलन कराएं और रस की निर्झरण हो ।
मंदिर का समय:
गर्मी
सवेरे 5:30 बजे - मंगला आरती
सवेरे 8:15 बजे - श्रृंगार आरती
दोपहर 12:45 बजे - राजभोग आरती
शाम 5:30 बजे - संध्या आरती
शाम 9:00 बजे - शयन आरती
समाज गायन - [7:30 PM]
सर्दी
सवेरे 7:00 बजे - मंगला आरती
सवेरे 8:30 बजे - श्रृंगार आरती
दोपहर 12:30 बजे - राजभोग आरती
शाम 5:30 बजे - संध्या आरती
शाम 8:15 बजे - शयन आरती
समाज गायन - [7:00 PM]

