पियकौ नाँचन सिखवत प्यारी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (230)

पियकौ नाँचन सिखवत प्यारी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (230)

(राग केदारौ)
पियकौ नाँचन सिखवत प्यारी।
वृंदावन महँ रास रच्यौ है, सरद-चंद उजियारी॥ [1]
ताल मृदंग उपंग बजावति, प्रफुलित ह्वै सखि सारी।
वीन, वेनुध्वनि नूपुर ठुमकत, खग, मृग दसा विसारी॥ [2]
मान, गुमान लकुट लियैं ठाढ़ी, डरपत कुंजविहारी।
व्यासस्वामिनी की छबि निरखत, हँसि हँसि दै कर तारी॥ [3]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (230)

प्यारी श्री राधा अपने प्रियतम श्री कृष्ण को नृत्य करना सिखा रही हैं। श्री वृन्दावन में शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि में महारास रचा गया है। [1]

सखियाँ प्रफुल्लित होकर मधुर स्वर-ताल में मृदंग आदि वाद्य यंत्र बजा रही हैं। वीणा एवं वेणु की मधुर धुन सर्वत्र व्याप्त हो रही है, तथा श्री कृष्ण के ठुमकने से नूपुरों की मधुर ध्वनि निसृत हो रही है, जिसके श्रवण से वन के खग-मृग अपने देह-भाव की सुधि तक भूल गए हैं। [2]

श्री राधारानी मान और गुमान-भाव का प्रदर्शन करती हुई हस्त-कमल में छड़ी लिए खड़ी हैं; उन्हें देख-देखकर श्री कृष्ण भी मानो भयभीत हो रहे हैं। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं— “श्री श्यामाश्याम की इस अद्भुत छवि को देखकर सखियाँ हँस-हँसकर ताली बजा रही हैं।” [3]