(राग गौरी)
किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊँ।
बैठी रहूं कुंजन के कोने, श्याम राधिका गाऊं॥ [1]
जो रज शिव सनकादिक लोचत, सो रज शीश चढ़ाऊँ।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत, विमल विमल जस गाऊं॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (293)
किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊँ।
बैठी रहूं कुंजन के कोने, श्याम राधिका गाऊं॥ [1]
जो रज शिव सनकादिक लोचत, सो रज शीश चढ़ाऊँ।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत, विमल विमल जस गाऊं॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (293)
हे किशोरी (श्री राधा)! मुझे अपने चरण-कमलों की रज प्रदान कीजिए, जिससे मैं वृन्दावन के किसी कुञ्ज के कोने में बैठकर दिव्य दम्पति श्री श्याम-राधिका का गुणगान कर सकूँ। [1]
जिस दिव्य रज को स्वयं शिव तथा सनकादि मुनि भी पाने की अभिलाषा रखते हैं, उसी रज को मैं अपने मस्तक पर धारण कर सकूँ। श्री हरिराम व्यास जी स्वामिनी श्री राधा के रूप-माधुरी की छवि निहारकर उनके विमल यश का गान करते हैं। [2]
जिस दिव्य रज को स्वयं शिव तथा सनकादि मुनि भी पाने की अभिलाषा रखते हैं, उसी रज को मैं अपने मस्तक पर धारण कर सकूँ। श्री हरिराम व्यास जी स्वामिनी श्री राधा के रूप-माधुरी की छवि निहारकर उनके विमल यश का गान करते हैं। [2]

