रे मन रसिकनि-संग बिनु, रंच न उपजै प्रेम।
या रस कौ साधन यहै, और करौ जिनि नेम॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (29)
वृन्दावन-रस की प्राप्ति का एकमात्र साधन रसिक संतों का संग और उनके चरणों में पूर्ण समर्पण ही है। इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य साधन, उपाय या प्रयास से उस दिव्य वृन्दावन-रस की उपलब्धि कदापि संभव नहीं है।
या रस कौ साधन यहै, और करौ जिनि नेम॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (29)
वृन्दावन-रस की प्राप्ति का एकमात्र साधन रसिक संतों का संग और उनके चरणों में पूर्ण समर्पण ही है। इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य साधन, उपाय या प्रयास से उस दिव्य वृन्दावन-रस की उपलब्धि कदापि संभव नहीं है।

