“अनुपम रूप, नीलमणि कोरी, उर धरि कर करि हाय! गिरत सोई,
लखत बार इक भूलेहुँ जोरी | ”
- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज
नीलमणि श्यामसुन्दर के सौन्दर्य का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है | जो भी, भूलकर भी, एक-बार भी, उस रूपमाधुरी का दर्शन कर लेता है वह ह्रदय पर हाथ रखकर एवं हाय ! कह कर मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है | उनके प्रत्येक अंगों की रूपमाधुरी पर करोड़ों कामदेव न्यौंछावर हैं |
लखत बार इक भूलेहुँ जोरी | ”
- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज
नीलमणि श्यामसुन्दर के सौन्दर्य का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है | जो भी, भूलकर भी, एक-बार भी, उस रूपमाधुरी का दर्शन कर लेता है वह ह्रदय पर हाथ रखकर एवं हाय ! कह कर मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है | उनके प्रत्येक अंगों की रूपमाधुरी पर करोड़ों कामदेव न्यौंछावर हैं |

