सबै अंग गुनहीन हौं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (6)

सबै अंग गुनहीन हौं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (6)

सबै अंग गुनहीन हौं, ताकौ जतन न कोई।
एक किसोरी कृपा तैं, जो कछु होइ सु होइ॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (6)

सर्वप्रथम, मैं तो सर्वथा गुणहीन और किसी भी साधन या यत्न से रहित हूँ। यह निश्चित है कि वृन्दावन-रस की प्राप्ति न तो अपने पुरुषार्थ से होती है और न ही किसी बाह्य यत्न से; वह केवल और केवल किशोरीजी की अहैतुकी कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है।