नहिं चाह स्वर्गादिक धाम, नहिं चाह बैकुंठ ललाम,
चाह श्याम प्रेम निष्काम, पुनी चह सेवा अविराम।
- ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज
हे श्री श्यामा श्याम, ना मुझे स्वर्ग की आकांक्षा है ना ही बैकुंठ की, मुझे केवल निष्काम प्रेम चाहिए जिससे आपकी निस्वार्थ सेवा कर सकूँ क्यूंकि सेवा निष्काम प्रेम से ही होगी ।
चाह श्याम प्रेम निष्काम, पुनी चह सेवा अविराम।
- ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज
हे श्री श्यामा श्याम, ना मुझे स्वर्ग की आकांक्षा है ना ही बैकुंठ की, मुझे केवल निष्काम प्रेम चाहिए जिससे आपकी निस्वार्थ सेवा कर सकूँ क्यूंकि सेवा निष्काम प्रेम से ही होगी ।

