“दोउ सेवक दोउ सेव्य परसपर, दोउ चित दोउ चितचोर।
दोउ मिलत लगत दोउन कहँ, पल सम कलप करोर। ”
- ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
श्री राधा कृष्ण दोनों एक दूसरे के सेवक भी हैं और सेव्य भी। वे एक दूसरे के हृदय भी हैं और चितचोर (हृदय चुराने वाले) भी हैं । वे एक दूसरे के संग ऐसे आनंद का अनुभव करते हैं कि उन्हें अनगिनत युग एक पल समान लगते हैं।
दोउ मिलत लगत दोउन कहँ, पल सम कलप करोर। ”
- ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
श्री राधा कृष्ण दोनों एक दूसरे के सेवक भी हैं और सेव्य भी। वे एक दूसरे के हृदय भी हैं और चितचोर (हृदय चुराने वाले) भी हैं । वे एक दूसरे के संग ऐसे आनंद का अनुभव करते हैं कि उन्हें अनगिनत युग एक पल समान लगते हैं।

