जहाँ गेंदा गुलाब अनेक खिले, बैठो क्यूँ करील की छावन में - ब्रज के सवैया

जहाँ गेंदा गुलाब अनेक खिले, बैठो क्यूँ करील की छावन में - ब्रज के सवैया

जहाँ गेंदा गुलाब अनेक खिले, बैठो क्यूँ करील की छावन में।
मन तोह मिले, विश्राम वही, वृषभान किशोरी के पायन में॥

- ब्रज के सवैया

अरे मन, जहाँ अनगिनत गुलाब खिले हुए हैं, तू क्यों करील की सूखी छाँव में बैठा है? जब तुझे वृषभानु किशोरी श्री राधारानी जैसी अद्भुत स्वामिनी प्राप्त हो गई, और उनके चरणों का मधुर आश्रय मिल गया, तो तू इस संसार में क्यों भटक रहा है?सच्चा विश्राम तुझे केवल उनके चरणों में मिलेगा, और कहीं नहीं।