धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः - श्रीमद भागवतम (10.44.15)

धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः - श्रीमद भागवतम (10.44.15)

या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-
प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो
धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ।।

- श्रीमद भागवतम (10.44.15)

वे ब्रज-स्त्रियाँ धन्य हैं, जो नित्य श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन रहती हैं, नित्य  उन्ही का गान करती हैं, आँसु बहाती हैं, अनेक गतिविधियां करते हुए भी जैसे दूध निकालना, चारा खिलाना, दही मथना, बच्चों को पालना, पौधों पर पानी छिड़कना और झाड़ू लगाना इत्यादि करते हुए भी अपने मन को नित्य प्रभु में ही तल्लीन किये हैं।