"मैं तो गोवर्धन को जाऊं मेरे वीर ! न माने मेरो मनुवा"
- ब्रज के लोकगीत
एक सखी दूसरे से कहती है, हे सखी! मैं ब्रज में गोवर्धन की दिव्य भूमि में जाना चाहती हूं! मेरा मन यहाँ रहना पसंद नहीं करता है।
- ब्रज के लोकगीत
एक सखी दूसरे से कहती है, हे सखी! मैं ब्रज में गोवर्धन की दिव्य भूमि में जाना चाहती हूं! मेरा मन यहाँ रहना पसंद नहीं करता है।

