मन में बसी बस चाह यही, पिय नाम तुम्हारा उचारा करूँ।
बिठला के तुम्हे मन मंदिर में, मन मोहिनी रूप निहारा करूँ॥
- ब्रज के सवैया
अब मेरी केवल यही एकमात्र इच्छा शेष है, कि मैं दिन-रात तुम्हारा ही नाम लेता रहूँ। अपने मन के मंदिर में तुम्हारे लिए सिंहासन सजाऊँ, और तुम्हारे अति मनमोहक रूप का दर्शन करते हुए कभी तृप्त न हो सकूँ।
बिठला के तुम्हे मन मंदिर में, मन मोहिनी रूप निहारा करूँ॥
- ब्रज के सवैया
अब मेरी केवल यही एकमात्र इच्छा शेष है, कि मैं दिन-रात तुम्हारा ही नाम लेता रहूँ। अपने मन के मंदिर में तुम्हारे लिए सिंहासन सजाऊँ, और तुम्हारे अति मनमोहक रूप का दर्शन करते हुए कभी तृप्त न हो सकूँ।

