कलि काल कुठार लिए फिरता, तन नम्र है चोट झिली न झिली।
ले ले हरिनाम मेरी रसना, फिर अंत समय ये मिली ना मिली॥
- ब्रज के सवैया
हे मन, कलियुग अपने हाथ में कुल्हाड़ी लिए चारों ओर विचर रहा है। तेरा शरीर कोमल है, यह उसके प्रहार सहन नहीं कर पाएगा। अभी समय है, अपनी रसना से नित्य हरिनाम जपता रह, क्योंकि कौन जानता है कि अंत समय तुझे यह अवसर मिले या न मिले। हरिनाम ही तेरा एकमात्र सहारा है।
ले ले हरिनाम मेरी रसना, फिर अंत समय ये मिली ना मिली॥
- ब्रज के सवैया
हे मन, कलियुग अपने हाथ में कुल्हाड़ी लिए चारों ओर विचर रहा है। तेरा शरीर कोमल है, यह उसके प्रहार सहन नहीं कर पाएगा। अभी समय है, अपनी रसना से नित्य हरिनाम जपता रह, क्योंकि कौन जानता है कि अंत समय तुझे यह अवसर मिले या न मिले। हरिनाम ही तेरा एकमात्र सहारा है।

