ये राधिकायां मयि केशवे मनाग्
भेदं न पश्यन्ति हि दुग्ध-शौक्लवत्
त एव मे ब्रह्म-पदं प्रयान्ति तद्
अहैतुक-स्फुर्जित-भक्ति-लक्षणाः
- गर्ग संहिता (2.15.32)
मुझमें (श्रीकृष्णमें) और तुममें (श्रीराधामें) कोई भी अंतर नहीं है। लीला रस की दृष्टि से तो ठीक, लेकिन जो अधम मनुष्य मुझे तुमसे पृथक मानता है दुर्भावना से, वह जब तक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, तबतक ‘कालसूत्र' नामक नरक में रहेगा।
भेदं न पश्यन्ति हि दुग्ध-शौक्लवत्
त एव मे ब्रह्म-पदं प्रयान्ति तद्
अहैतुक-स्फुर्जित-भक्ति-लक्षणाः
- गर्ग संहिता (2.15.32)
मुझमें (श्रीकृष्णमें) और तुममें (श्रीराधामें) कोई भी अंतर नहीं है। लीला रस की दृष्टि से तो ठीक, लेकिन जो अधम मनुष्य मुझे तुमसे पृथक मानता है दुर्भावना से, वह जब तक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, तबतक ‘कालसूत्र' नामक नरक में रहेगा।

