गोप्यः किमाचरदयं कुशलंसमवेणुं - श्रीमद भागवतमहापुराण(10.21.9)

गोप्यः किमाचरदयं कुशलंसमवेणुं - श्रीमद भागवतमहापुराण(10.21.9)

गोप्यः किमाचरदयं कुशलंसमवेणुं - दामोरदाराधर सुधामपि गोपिकानाम्। भुँड्कते स्वयं यदवशिष्ट रसं ||
 - श्रीमद भागवतमहापुराण (10.21.9)

एक गोपी अपनी मित्र से कहती है की मुझे आश्चर्य होता है कि इस मुरली ने कौन से ऐसे शुभ कर्म किए हैं कि श्री कृष्ण इनको नित्य ही अपने होठों से लगाए रखते हैं, और यह मुरली नित्य ही रस का पान करती रहती है।