मुक्ति पूछे गोपाल से, मेरि मुक्ति बताये।
ब्रज रज उड़ मस्तक लगे, मुक्ति मुक्त होइ जाए॥
- ब्रज के दोहे
एक समय स्वयं मुक्ति-देवी ने पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण से विनयपूर्वक जिज्ञासा की, "हे प्रभु! यद्यपि मैं चराचर जगत के जीवों को भव-बंधन से मुक्त करती हूँ, तथापि मेरी अपनी परम सद्गति और उद्धार किस प्रकार संभव है?"
श्रीकृष्ण ने मंद हास्य के साथ उत्तर दिया, "तुम श्रीधाम ब्रज की शरण में जाओ; जब उस अलौकिक ब्रजभूमि की पावन रज (धूलि) तुम्हारे मस्तक का स्पर्श करेगी, तब तुम भी पूर्णतः कृतार्थ और मुक्त हो जाओगी—ब्रज-रज के प्रभाव से ही तुम्हारा वास्तविक उद्धार होगा।"
ब्रज रज उड़ मस्तक लगे, मुक्ति मुक्त होइ जाए॥
- ब्रज के दोहे
एक समय स्वयं मुक्ति-देवी ने पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण से विनयपूर्वक जिज्ञासा की, "हे प्रभु! यद्यपि मैं चराचर जगत के जीवों को भव-बंधन से मुक्त करती हूँ, तथापि मेरी अपनी परम सद्गति और उद्धार किस प्रकार संभव है?"
श्रीकृष्ण ने मंद हास्य के साथ उत्तर दिया, "तुम श्रीधाम ब्रज की शरण में जाओ; जब उस अलौकिक ब्रजभूमि की पावन रज (धूलि) तुम्हारे मस्तक का स्पर्श करेगी, तब तुम भी पूर्णतः कृतार्थ और मुक्त हो जाओगी—ब्रज-रज के प्रभाव से ही तुम्हारा वास्तविक उद्धार होगा।"

