पाँचे भूलै देह सुध, छठे भावना रास की।
सातै पावै रीति रस, श्री स्वामी हरिदास की॥
- श्री भगवत रसिक, अनन्यनिश्चयात्मक ग्रंथ, उत्तरार्ध (36)
भक्ति के विभिन्न चरण हैं। पाँचवीं अवस्था में साधक को अपनी देह-स्मृति का पूर्ण विस्मरण हो जाता है और छठी अवस्था में वह दिव्य महारास के अलौकिक रस का आस्वादन करता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में इसी को परम साध्य बताया गया है, किंतु श्री भगवदरसिक जी के अनुसार, इससे भी श्रेष्ठ एक अवस्था है, जहाँ जीव को श्रीवृन्दावन की विशुद्ध प्रेममयी रस-रीति और 'नित्य-विहार-रस' की प्राप्ति होती है, जिसका गान रसिक शिरोमणि स्वामी श्रीहरिदासजी ने अपनी वाणी में किया है।
सातै पावै रीति रस, श्री स्वामी हरिदास की॥
- श्री भगवत रसिक, अनन्यनिश्चयात्मक ग्रंथ, उत्तरार्ध (36)
भक्ति के विभिन्न चरण हैं। पाँचवीं अवस्था में साधक को अपनी देह-स्मृति का पूर्ण विस्मरण हो जाता है और छठी अवस्था में वह दिव्य महारास के अलौकिक रस का आस्वादन करता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में इसी को परम साध्य बताया गया है, किंतु श्री भगवदरसिक जी के अनुसार, इससे भी श्रेष्ठ एक अवस्था है, जहाँ जीव को श्रीवृन्दावन की विशुद्ध प्रेममयी रस-रीति और 'नित्य-विहार-रस' की प्राप्ति होती है, जिसका गान रसिक शिरोमणि स्वामी श्रीहरिदासजी ने अपनी वाणी में किया है।

