(सवैया)
ब्रह्म में ढूँढ्यौ पुरानन गानन, बेद-रिचा सुनि चौगुने चायन। [1]
देख्यौ सुन्यौ कबहूँ न कितूँ वह, कैसे सरूप औ कैसे सुभायन॥ [2]
टेरत हेरत हारि परयौ, रसखानि बतायो न लोग लुगायन। [3]
देख्यौ दुरौ वह कुंज-कुटीर में, बैठौ पलोटत राधिका-पायन॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
श्री रसखान कहते हैं—
मैंने ब्रह्म (श्री कृष्ण) को ढूंढ़ने का बहुत प्रयास किया। उन्हें पुराणों में खोजा, वेदों की ऋचाओं को बड़े चाव से सुना, यह सोचकर कि कदाचित इसमें ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाए। परंतु दुर्भाग्य से, मैंने उन्हें वहाँ कहीं नहीं पाया। [1]
मेरे सारे प्रयत्न निष्फल हुए। मैंने न तो उन्हें कहीं देखा और न ही सुना कि वे किस रूप के हैं और उनका स्वभाव कैसा है। [2]
उस ब्रह्म को पुकारते-पुकारते एवं ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैं थक गया, परंतु कोई भी उनके बारे में बताने में असमर्थ रहा। [3]
हार कर मैंने पाया कि बहुत दूर एक कुंज में, श्री कृष्ण श्री राधारानी के चरणों में बैठे हैं एवं प्रेम से उनके चरण दबा रहे हैं। अंततः वे श्री कृष्ण श्री राधा के चरणों में ही मुझे मिले। [4]
ब्रह्म में ढूँढ्यौ पुरानन गानन, बेद-रिचा सुनि चौगुने चायन। [1]
देख्यौ सुन्यौ कबहूँ न कितूँ वह, कैसे सरूप औ कैसे सुभायन॥ [2]
टेरत हेरत हारि परयौ, रसखानि बतायो न लोग लुगायन। [3]
देख्यौ दुरौ वह कुंज-कुटीर में, बैठौ पलोटत राधिका-पायन॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
श्री रसखान कहते हैं—
मैंने ब्रह्म (श्री कृष्ण) को ढूंढ़ने का बहुत प्रयास किया। उन्हें पुराणों में खोजा, वेदों की ऋचाओं को बड़े चाव से सुना, यह सोचकर कि कदाचित इसमें ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाए। परंतु दुर्भाग्य से, मैंने उन्हें वहाँ कहीं नहीं पाया। [1]
मेरे सारे प्रयत्न निष्फल हुए। मैंने न तो उन्हें कहीं देखा और न ही सुना कि वे किस रूप के हैं और उनका स्वभाव कैसा है। [2]
उस ब्रह्म को पुकारते-पुकारते एवं ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैं थक गया, परंतु कोई भी उनके बारे में बताने में असमर्थ रहा। [3]
हार कर मैंने पाया कि बहुत दूर एक कुंज में, श्री कृष्ण श्री राधारानी के चरणों में बैठे हैं एवं प्रेम से उनके चरण दबा रहे हैं। अंततः वे श्री कृष्ण श्री राधा के चरणों में ही मुझे मिले। [4]

