(राग गौरी)
किशोरी मोहि अपनी कर लीजै।
और दिये कछु भावत नाहीं, श्री वृन्दावन रज दीजै॥ [1]
खग मृग पशु पंछी या बनके, चरन सरन रख लीजै।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत, महल टहलनी कीजै॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (294)
किशोरी मोहि अपनी कर लीजै।
और दिये कछु भावत नाहीं, श्री वृन्दावन रज दीजै॥ [1]
खग मृग पशु पंछी या बनके, चरन सरन रख लीजै।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत, महल टहलनी कीजै॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (294)
हे किशोरी जी! जैसे भी हो, मुझे अपना बना लीजिए; और कुछ दीजिए या न दीजिए, पर वृन्दावन-रज (ब्रजवास) अवश्य प्रदान कीजिए। [1]
भले ही वृन्दावन में पक्षी, हिरण अथवा किसी पशु के रूप में जन्म मिले, किन्तु मुझे अपने चरण-कमलों की शरण में रख लीजिए। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं— “हे स्वामिनी श्री राधा! मुझे अपने निज महल की टहलनी (दासी) बनाइए, जहाँ मैं नित्य आपकी सेवा एवं दिव्य छवि का दर्शन पाऊँ।” [2]
भले ही वृन्दावन में पक्षी, हिरण अथवा किसी पशु के रूप में जन्म मिले, किन्तु मुझे अपने चरण-कमलों की शरण में रख लीजिए। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं— “हे स्वामिनी श्री राधा! मुझे अपने निज महल की टहलनी (दासी) बनाइए, जहाँ मैं नित्य आपकी सेवा एवं दिव्य छवि का दर्शन पाऊँ।” [2]

