ब्रज की रेनु रेनु लखि चिन्मय,तन्मय रहु अविराम।
पै "कृपालु" मन ! जनि यह भूलिय, भाव रहे निष्काम।।
प्रेम रस मदिरा ( धाम-माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
अरे मन ! ब्रज के प्रत्येक कण-कण में चिन्मय-स्वरुप देखते हुए सदा ही तन्मय रहा करना। "श्री कृपालु जी" कहते हैं कि हे मन ! किन्तु यह न भूलना की इन सब में तेरा भाव निष्काम ही रहे ।
पै "कृपालु" मन ! जनि यह भूलिय, भाव रहे निष्काम।।
प्रेम रस मदिरा ( धाम-माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
अरे मन ! ब्रज के प्रत्येक कण-कण में चिन्मय-स्वरुप देखते हुए सदा ही तन्मय रहा करना। "श्री कृपालु जी" कहते हैं कि हे मन ! किन्तु यह न भूलना की इन सब में तेरा भाव निष्काम ही रहे ।

