वृंदावन रस अति सरस है, कैसो करूँ बखान।
जेहि आगे बैकुंठ को, फीको लागत पयान॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, आनंदाष्टक (8)
हे जीवों! वृन्दावन-रस इतना आनंदित एवं सरस है कि कोई भी इसे बखान नहीं कर सकता। यहाँ तक कि भगवान विष्णु का "वैकुण्ठ धाम" भी इसकी तुलना में बेस्वाद है।
जेहि आगे बैकुंठ को, फीको लागत पयान॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, आनंदाष्टक (8)
हे जीवों! वृन्दावन-रस इतना आनंदित एवं सरस है कि कोई भी इसे बखान नहीं कर सकता। यहाँ तक कि भगवान विष्णु का "वैकुण्ठ धाम" भी इसकी तुलना में बेस्वाद है।

