रवति कहुँ, मुरली कुंज कुटीर -जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज

रवति कहुँ, मुरली कुंज कुटीर -जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज

“रवति कहुँ, मुरली कुंज कुटीर !
शिव सनकादि परमहंसन दृग, जर जर बरसत नीर। "

-जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज

श्री कृष्ण की बांसुरी को सुनकर "शिव", "सनकादि" जैसे महान परमहंस निरंतर प्रेम के आँसू बहा रहे हैं। हे सखी! ब्रज के कुंजों से बाँसुरी की मधुर ध्वनि सुनाई दे रही है।