श्लोक 1
नव ललितवयस्कौ नव्यलावण्यपुञ्जौ
नव रस चलचित्तौ नूतनप्रेमवित्तौ।
नव निधुवनलीला कौतुकेनातिलोलौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
रे मन! तू परम मनोहर कैशोर वयस वाले और मुक्ता फल की छाया की तरह नव-लावण्य के राशि रूप तथा नवायमान श्रृंगाररस में चञ्चल चित्त वाले तथा जिनके नवीन प्रेम ही परम धन है और निधुवन की लीला कौतुक में अत्यन्त चञ्चल श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 2
द्रुतकनक- सुगौरस्निग्धमेघौघनील
च्छविभिरखिलबृन्दारण्यमुद्भाषयन्तौ।
मृदुलनवदुकूले नीलपीते दधानौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
हे मन ! द्रवायमान सुवर्ण तथा सघन मेघ समूह की भाँति गौर नील कान्तियों से समग्र वृन्दाबन को भासमान करने वाले, नवीन मृदुल नील पीत पाटम्बर धारीणि, श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 3
प्रथममिलनभीतोद्भाषिताश्वासवाचौ
प्रियतम - भुजरोधव्यग्रहस्तौ रतोत्कौ।
अलमलमितिलीला गद्गदोक्त्युन्मदान्धौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
नव संगम में भीत तथा कोमल आश्वासना देने वाले, भुज प्रसारण तथा भुज रोध में व्यग्र हस्त वाले, क्रीडा में उत्कण्ठित, "छोड़िये छोड़िये मत जाइये, मत जाइये" इस प्रकार गद्गद् बोलने वाले, आनन्दमत्त श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 4
प्रियरतिसमनुज्ञामार्गनानम्रवक्वो
न्नमितचिवुकदृष्ट्या स्मेरकान्ताननाब्जौ।
किमिह कुरुष इत्यास्वाद्यवाक्किञ्चनोक्ती
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
प्रिय के रति प्रयोग में अनुमति जान कर नम्रवदना तथा चिबुक उठा कर उसमें दृष्टि के द्वारा ईषत् हास्य युक्त मनोहर बदन कमल वाले और "सखी मण्डल के बीच यह क्या करते हैं" इस प्रकार आस्वाद योग्य वचन समूह को बोलने वाली, तथा रहस्य प्रकाशक मन्द मन्द बोलने वाले श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 5
प्रतिपद प्रतिकूलानुग्रहव्यग्रमूर्त्ती
बहु विरचित नाना चाटुकारप्रकारौ।
नवसुरत -विलासोत्सुक्यगूढ़प्रकाशौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
पद-पद में प्रिया के द्वारा हठ करने के कारण तथा प्रिय के द्वारा आग्रह करने के कारण चंचल मूर्ति वाले, नाना प्रकार के चाटु वचन व्यवहारकारी, नव नव सुरत प्रयोग के विलास में उत्कण्ठित होकर प्रिया के द्वारा गोपन तथा प्रिय के द्वारा प्रकाश करने वाले श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 6
सुरतकलह सौख्यैः काकुवादप्रणामा-
धिकविरचितमान्यौ दुर्गमप्रेमभंगौ।
स्मितमधुरमृदूपालम्भह्रन्नीतकान्तौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
सुरत कलह सुख में काकुवाद और प्रणाम के द्वारा अधिक गौरव बढ़ाने वाले, जिनके प्रेम सागर की तरङ्ग दुर्बोध है, उन मन्दहास्य के साथ कोमल तिरस्कारादि करने में व्यग्र हृदय श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 7
नव किशलयतल्पे कल्पयन्तौ विचित्रां
सुरतसमरलीलामुन्मदानंगरङ्गौ।
ललित वलय काञ्ची नूपूरध्वानरम्यौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
नवीन किसलय निर्मित शय्या में विचित्र सुरत युद्ध बढ़ाने वाले, उद्गत अनङ्ग रङ्ग में मत्तता जिनके, ललित वलय, किंकिणी, नूपुर ध्वनियों से मनोहर श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 8
प्रियकरपरिमर्दोजृम्भमानोरुवक्षो-
रुहमनसिजकण्डूद्दण्डकन्दर्पलोलौ।
नमित दयितपाणि स्पृष्टनीवीनिवन्धौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
श्रीकृष्ण के हस्त द्वारा बारम्बार संघर्ष से उठा है स्तन कमलों में कामकण्डू जिनकी तथा उद्दण्डता कन्दर्प केलि के कारण चंचल हृदय जिनके ऐसे दोनों, नीविबन्धन स्पर्श करने में वा कराने में जिनसे प्रिय के हस्तकमल स्थापित हुए हैं ऐसे श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 9
प्रियतम-कृत-गाढ़ाश्लेषखर्व्वायितोरु
स्तनमुकुल मनोज्ञावल्लभैकात्मतेच्छुः।
किमपि रचित शुष्कक्रन्दितोदारहासौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
प्रियतम के गाढ़ आलिंगन से खर्व्वित स्तन मुकुल के द्वारा मनोहारिणी, प्रियतमा के साथ एकात्मता भाव को चाहने वाले, शुष्क रोदन करने वाली तथा उदार हास्ययुक्त श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 10
सततसुरततृष्णाव्याकुलाबुन्मदिष्णू
विपुलपुलकराजद्गौरनीलोज्वलाङ्गौ।
मिथ उरुपरिरम्भादेकदेहायमानौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
निरन्तर सुरत रस तृष्णा में व्याकुल, उन्मत्त, विपुल पुलकावलि से शोभायमान गौर नील उज्वल शरीर वाले और परस्पर के निविड़ आलिंगन से मानो एक देह रूप, श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 11
सततमपरिमानोज्जृम्भमानानुरागौ
मदरसभरसिन्धू लोलदोलायिताङ्गौ।
दलितसक्लसेतू धन्यगोप्येकरम्यौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
जिनके निरन्तर उच्छलित असीम अनुराग गर्व रसाधिक्य के सागर के समान, चंचल दोलायमान अङ्ग हैं और जिनके नाश हो रहा है धैर्य्य दैन्यादिक भाव समूह अथवा लोकवेद से अतीत, सुकृत स्वरूपा गोपियों से मनोहर श्री राधिका कृष्ण चन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 12
विलुलितवरबेणी - हारमालावतंसौ
मृदुलमधुरहासोल्लासिवक्त्रेन्दुविम्बौ।
अतिरस मदलोलौ चित्रकन्दर्पकेली
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
जिनकी श्रेष्ठ वेणियाँ, हार, माल्य, भूषणादिक विदलायमान हो गये हैं और मन्द मधुर हास्य से जिनका मुख चन्द्रविम्ब उल्लसित है तथा जिनकी अतिशय सुरत गर्व से चपल, विस्मापनी कन्दर्पसम्बन्धिनी क्रीडा है ऐसे श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 13
सुरतरसमदान्धौ सन्ततं सन्तरन्तौ
त्रुटित वलय काञ्ची दाम हारावलिकौ।
मणिकनक विभूषोत्सारभास्वत्पराङ्गौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
सुरतरस के गर्व सागर में निरन्तर तहरने वाले, जिनके वलय, किंकिणी, पुष्पों की मालायें हार समूह टूट गये हैं, मणि कनक भूषणादिक अस्त व्यस्त हो जाने से जिनके उत्तम अंग प्रत्यंग शोभायमान हो रहे हैं, ऐसे श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्च में स्मरण कर।
श्लोक 14
स्तवकित मणिदाम्ना प्रेयसागुम्फितात्य-
द्भुत सुललितवेणी प्रेयसीक्लृप्तचूडौ।
मिथ उदयदखण्ड प्रेम रज्जू विबद्धौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
गुच्छायमान तथा प्रिय के द्वारा ग्रंथित (गूंथी हुई) मणिमाला से जिनकी वेणी सुललित हो रही है, और श्रीप्रिया के द्वारा जिनकी चूडा रची गयी है, परस्पर के उदय प्राप्त अखण्ड प्रेम रज्जु से परस्पर विशेषरूप से बन्ध जाने वाले, ऐसे श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 15
जघनलुलितवेणी विस्फुरत्वर्हचूडौ
कनक रुचिरचूडा कंकणद्वन्द्वपाणी।
विलसदरुणरोचिः पतिकौशेयवासौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
जंघों में चञ्चल मनोहर वेणी वाली तथा शोभायमान मयूरपंख की चुडा वाले, सुवर्ण निम्मित रुचिर चूडा तथा दोनों हस्त में कंकण धारण करने वाले, शोभायमान अरुण कान्ति तथा पीत कौशेय वस्त्र धारण कारी श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 16
कनकजलदगात्रौ नीलशोणाब्जनेत्रौ
मृगमदरसभालौ मालती कुन्दमालौ।
तरलतरुणवेशौ नीलपीताम्बरेशौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
जो सुवर्ण तथा जलद शरीर वाले हैं और जिनके नील तथा रक्त कमल की तरह नेत्र हैं और जो कपोल देश में मृगमद रस तथा गले में मालती, कुन्द माला धारण करते हैं, जिनका नवीन वेश है, नीलाम्बर तथा पीताम्बर धारी उन श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 17
ललितनवकिशोरौ नव्यलावण्यपुञ्जौ
सकलरसिक चूडालंकृती मुग्धबेशौ।
मधुरमधुर मूर्ती विद्युदम्भोदकान्ती
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
अभिनव ललित किशोर वय वाले, नवीन लावण्य की राशि, रसिक समुदाय के शिरोभूषण के अलंकार स्वरूप अर्थात परम रसिक शेखर, सुन्दर वेषधारी, अत्यन्त मधुर मूर्ति वाले, विद्युत् तथा मेघ की कान्ति की तरह कान्तियुक्त अर्थात् कान्त्यामृत तथा रसिकतामृतों की वर्षण से निजापेक्षित भक्त शस्यों के जीवनरूप श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 18
किमपि परमशोभामाधुरीरूपचेष्टा
हसित ललित दृष्टपात्यद्भूतोत्कर्षकाष्ठाम्।
परमरसरहस्यावेशतः सन्दधानौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
परम रस रहस्य में आवेश के कारण जो अत्यन्त शोभा, माधुर्य्य, सौन्दर्य्य, चेष्टा, हास्य, रसमयी भर्त्सना, परिहास, कोपसूचक दृष्टि इत्यादि के द्वारा अद्भुतता की चरम सीमा को धारण करने वाले हैं, उन श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 19
निखिलनिगमगूढ़ौ नित्यमन्यान्यगाढ़
प्रणयभरविवृद्धौ तुङ्गितानङ्ग चेष्टौ
सुरतरसमदान्वौ न्यस्तजीवौ मिथोऽङ्गे।
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
अत्यन्त प्रेम विषय के कारण निखिल निगम करके गुप्त रूप, नित्य परस्पर निविड प्रीति के आधिक्य वश वृद्धि प्राप्त अर्थात् पुष्ट है, और जो प्राकृत अनंगचेष्टा में शोभायमान, सुरतरस मदान्ध, परस्पर एक दूसरे के लिये जीवन समर्पण करने वाले हैं उन श्रीराधिकाकृष्णचंद्रको निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 20
रमणवदनचन्द्रे दत्तताम्बुलवीटी
निजरसनिधिवक्त्रे दत्ततच्चर्व्यभागौ।
मिथ उरुरसदाङ्ग स्पर्शलोलुभ्यमानौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
परस्पर-परस्पर के रमणीय वदनचन्द्र में ताम्बूल का वीड़ा अर्पण करने वाले तथा प्रियतम के द्वारा उसका चर्व्वणांश प्रियतमा के मुख में प्रदान करने में व्यग्र और परस्पर अत्यन्त रसद अंग प्रत्यंगों को स्पर्श करने में लोलुप श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृतनिकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 21
अति रसमदवेगान्निस्त्रपाधैर्य्यदृष्टी
क्रम समुदित तत्तत् सौरताश्चर्य्यनिती।
वहिरतिरसलीलानुव्रताज्ञामवर्ण्णौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
अत्यन्त रस मत्तता के वेग से जिनकी लज्जा रहित तथा धैर्य्य शून्य दृष्टि है और जिनकी क्रम से सुरतचर्य्या की आश्चर्य्यनीति उदय हो रही है और जिनके लीलागृह के बाहर अत्यन्त रसमयी उनकी लीला के पात्र रूप सखी मन्जरी गण विराजमान होकर उन लीला का वर्णन करते हुए आस्वादन कर रहे हैं, उन श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 22
रजत भवन रन्ध्रायातसन्मन्दशीता
निलविदलिततुङ्गानङ्गसंग्रामखेदौ।
क्षणसहचररम्यारव्धभूयो विहारौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
मणिमय भवन के गवाक्ष रन्ध्रों में जाने आने वाले सुगन्ध मन्द शीतल पवनों से जिनके अनंग संग्राम के श्रम लुप्त हो रहा है और जो उत्सव परायण सहचरी गणोंके द्वारा उत्सुक हो पुनर्वार विहार सुख आरम्भ कर रहे हैं उन श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 23
तदति ललित लीला लोल लोलाङ्ग लक्ष्यौ
सुललित ललितादे र्निर्णिमेषाक्षिरन्ध्रैः।
हृदयमुपनयन्तौ पूर्ण सौख्याम्बुराशी
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
मधुररस परिकरों की मनोहारिणी अति सुन्दर सुरतलीला में जिनके कटि, नितम्ब, बाहु, मुखादिक सकल अंग चंचलायमान होने के कारण मानों लक्ष संख्या हो रहे हैं और जो सुललित ललितादि सखियों के निमेष रहित नयन द्वारों से हृदय देश में प्राप्त हो रहे हैं तथा जो पूर्ण सौख्य के सागर रूप हैं, ऐसे श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 24
प्रणयमयवयस्याः कुञ्जरन्ध्रार्पिताक्षी:
क्षितितलमनुलब्ध्वानन्दमूर्च्छा पतन्तीः।
प्रतिरतिविदधानौ चेष्टितैश्चित्रचित्रैः
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
रति के पद-पद में विचित्र से विचित्र चेष्टाओं के द्वारा निकुंज गवाक्ष जाल के छिद्रों में नयन अर्पण करने वाली अथच पृथ्वी में आनन्द मूर्छा को प्राप्त होने वाली प्रेममयी सखियों को हृदय में धारण करने वाले, श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 25
बहुविधपरिमृष्टान्योन्यगात्रावजस्त्र
बहुविध परिपृच्छा कारितान्यान्यवाचौ।
अनिमिषनयनालि स्वादितान्यान्यवक्त्रौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
निरन्तर पारस्परिक हस्त कमल के द्वारा अंग समूह मार्जन करने वाले तथा अनेक प्रकार की जिज्ञासाओं के द्वारा अनेक प्रकार की वचन रचना सृष्टि करने वाले, निमेष रहित नयन रूप सखियों के द्वारा पारस्परिक मुख कमल आस्वादनकारी श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 26
मनसिजरससिन्धोरद्भुतावर्त्तवेग
भ्रमिततनुमनस्कौ केलिविस्मापिताली।
बहुविधरसगात्रस्पर्शजल्पप्रहासौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
जिनके शरीर और मन कन्दर्परस - सागर के अद्भुत आवर्त्तन ( घूर्णन ) के वेग से चलायमान हैं और जो क्रीड़ा समूह से सखीवृन्दों को विस्मय करने वाले हैं तथा जो परस्पर अनेक प्रकार के रसमय शरीर का स्पर्श और हास्य वचन युक्त हैं उन श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 27
वहुलसुरतखेलायाससंखिन्नगात्रौ
दयितनिजसखिभि र्वीज्यमानौ पटान्तैः।
सरसभुजगवल्ली पल्लवास्वादिवक्त्रौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
जिनके शरीर अनेक प्रकार की सुरतक्रीड़ा के परिश्रम से खेद प्राप्त हो रहा है तथा जो निज प्रिय सखियों के द्वारा पटाञ्चल से वीज्यमान हैं और जिनके मुख कमल सरस ताम्बूल पल्लव के आस्वादन से शोभायमान है, ऐसे श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 28
मिथ उरुपुलकश्री दोर्ल्लताबद्धकण्ठौ
व्यतिमिलितमुखेन्दू किंकणी लालितांघ्री।
नवरतिरसखेला श्रान्तितन्द्रालुनेत्रौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
विपुल पुलकावलि से परस्पर शोभायमान, जिनके गल-देश परस्पर की भुजलताओं से वेष्टित है और परस्पर के मुख कमल में परस्पर मुख मिलाने वाले, तथा जिनके चरण कमल किंकिणी से शोभायमान है और जो नवीन रतिरस क्रीड़ा से श्रान्ति प्राप्त हैं अर्थात् जिनके नेत्र कमल निद्रारस से व्याकुल हैं ऐसे श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 29
सुरतरससमुद्रे पादमाचूडमग्नौ
त्रुटिलवमिव यातां मन्यमानौ त्रियामाम्।
प्रतिनिमिषमसीमोजृम्भितानङ्गतृष्णौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
सुरत रस सागर में आपाद मस्तक (चरण से लेकर मस्तक पर्यन्त) मग्न शील, त्रुटि लव काल को भी एक रात्रि मानने वाले, तथा जिनके निमेष-निमेष में असीम अनंग तृष्णा उठती है ऐसे श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 30
तदतिमधुरधाम्नि नाम्नि वात्सल्यमात्रात्
कथमपि कलनीयौ कस्यचिद्भाग्यसीम्नः।
श्रूतिततिभिरगम्यौ सत्सभाजस्रसङ्गौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
नाम धाम के वात्सल्य मात्र अर्थात् अति अल्पमात्र यत् किंचित् नाम धाम के अनुशीलन से सीमा प्राप्त सौभाग्य क्षेत्र शील किसी व्यक्ति का हेला व श्रद्धा से भी ग्रहण रूप, वेद समूह से अगम्य, निखिल सज्जनों द्वारा वन्दनीय, केवल सखी मञ्जरियों की सभा में संप्राप्त श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 31
परमरसग्हस्य नन्दनिस्यन्दिवृन्दा
वनविपिननिकुञ्जे दिव्यदिव्यै र्विलासैः।
निरवधिरसमानौ राधिका कृष्णचन्द्रौ
भज सकलमुपेक्ष्य तावकी शास्त्रयुक्ती॥
रे मन ! देह, गेह, शास्त्रयुक्ति, प्रभृति का पूर्णतः उपेक्षा करके परमरस रहस्य आनन्द के सागर रूप वृन्दावन के निकुंज में दिव्यातिदिव्य विलासों से निरन्तर शोभायमान श्रीराधिका कृष्णचन्द्र का भजन कर।
श्लोक 32
स्तवमिममतिरम्यं राधिकाकृष्णचन्द्र
प्रमदभरविलासैरद्भूतं भावयुक्तः।
पठति य इह रात्रौ नित्यमव्यग्रचित्तः
विमलमतिसु राधालीसु सख्यं लभेत॥
जो भावयुक्त होकर रात्रिकाल में स्थिरचित्त से राधिका कृष्ण चंद्र के प्रमोद भरे विलासों से अद्भुत मनोहर इस स्तव का पाठ करे वह विमल मतिवाली राधिका की सखियों में सख्य रूप को प्राप्त होता है अर्थात् सखी रूप होकर युगल सरकार की सेवा को प्राप्त करता है।
इति श्रीमद् रूप गोस्वामिना विरचितः
श्रीनिकुञ्जरहस्यस्तवः समाप्तः
नव ललितवयस्कौ नव्यलावण्यपुञ्जौ
नव रस चलचित्तौ नूतनप्रेमवित्तौ।
नव निधुवनलीला कौतुकेनातिलोलौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
रे मन! तू परम मनोहर कैशोर वयस वाले और मुक्ता फल की छाया की तरह नव-लावण्य के राशि रूप तथा नवायमान श्रृंगाररस में चञ्चल चित्त वाले तथा जिनके नवीन प्रेम ही परम धन है और निधुवन की लीला कौतुक में अत्यन्त चञ्चल श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 2
द्रुतकनक- सुगौरस्निग्धमेघौघनील
च्छविभिरखिलबृन्दारण्यमुद्भाषयन्तौ।
मृदुलनवदुकूले नीलपीते दधानौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
हे मन ! द्रवायमान सुवर्ण तथा सघन मेघ समूह की भाँति गौर नील कान्तियों से समग्र वृन्दाबन को भासमान करने वाले, नवीन मृदुल नील पीत पाटम्बर धारीणि, श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 3
प्रथममिलनभीतोद्भाषिताश्वासवाचौ
प्रियतम - भुजरोधव्यग्रहस्तौ रतोत्कौ।
अलमलमितिलीला गद्गदोक्त्युन्मदान्धौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
नव संगम में भीत तथा कोमल आश्वासना देने वाले, भुज प्रसारण तथा भुज रोध में व्यग्र हस्त वाले, क्रीडा में उत्कण्ठित, "छोड़िये छोड़िये मत जाइये, मत जाइये" इस प्रकार गद्गद् बोलने वाले, आनन्दमत्त श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 4
प्रियरतिसमनुज्ञामार्गनानम्रवक्वो
न्नमितचिवुकदृष्ट्या स्मेरकान्ताननाब्जौ।
किमिह कुरुष इत्यास्वाद्यवाक्किञ्चनोक्ती
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
प्रिय के रति प्रयोग में अनुमति जान कर नम्रवदना तथा चिबुक उठा कर उसमें दृष्टि के द्वारा ईषत् हास्य युक्त मनोहर बदन कमल वाले और "सखी मण्डल के बीच यह क्या करते हैं" इस प्रकार आस्वाद योग्य वचन समूह को बोलने वाली, तथा रहस्य प्रकाशक मन्द मन्द बोलने वाले श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 5
प्रतिपद प्रतिकूलानुग्रहव्यग्रमूर्त्ती
बहु विरचित नाना चाटुकारप्रकारौ।
नवसुरत -विलासोत्सुक्यगूढ़प्रकाशौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
पद-पद में प्रिया के द्वारा हठ करने के कारण तथा प्रिय के द्वारा आग्रह करने के कारण चंचल मूर्ति वाले, नाना प्रकार के चाटु वचन व्यवहारकारी, नव नव सुरत प्रयोग के विलास में उत्कण्ठित होकर प्रिया के द्वारा गोपन तथा प्रिय के द्वारा प्रकाश करने वाले श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 6
सुरतकलह सौख्यैः काकुवादप्रणामा-
धिकविरचितमान्यौ दुर्गमप्रेमभंगौ।
स्मितमधुरमृदूपालम्भह्रन्नीतकान्तौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
सुरत कलह सुख में काकुवाद और प्रणाम के द्वारा अधिक गौरव बढ़ाने वाले, जिनके प्रेम सागर की तरङ्ग दुर्बोध है, उन मन्दहास्य के साथ कोमल तिरस्कारादि करने में व्यग्र हृदय श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 7
नव किशलयतल्पे कल्पयन्तौ विचित्रां
सुरतसमरलीलामुन्मदानंगरङ्गौ।
ललित वलय काञ्ची नूपूरध्वानरम्यौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
नवीन किसलय निर्मित शय्या में विचित्र सुरत युद्ध बढ़ाने वाले, उद्गत अनङ्ग रङ्ग में मत्तता जिनके, ललित वलय, किंकिणी, नूपुर ध्वनियों से मनोहर श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में तू स्मरण कर।
श्लोक 8
प्रियकरपरिमर्दोजृम्भमानोरुवक्षो-
रुहमनसिजकण्डूद्दण्डकन्दर्पलोलौ।
नमित दयितपाणि स्पृष्टनीवीनिवन्धौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
श्रीकृष्ण के हस्त द्वारा बारम्बार संघर्ष से उठा है स्तन कमलों में कामकण्डू जिनकी तथा उद्दण्डता कन्दर्प केलि के कारण चंचल हृदय जिनके ऐसे दोनों, नीविबन्धन स्पर्श करने में वा कराने में जिनसे प्रिय के हस्तकमल स्थापित हुए हैं ऐसे श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 9
प्रियतम-कृत-गाढ़ाश्लेषखर्व्वायितोरु
स्तनमुकुल मनोज्ञावल्लभैकात्मतेच्छुः।
किमपि रचित शुष्कक्रन्दितोदारहासौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
प्रियतम के गाढ़ आलिंगन से खर्व्वित स्तन मुकुल के द्वारा मनोहारिणी, प्रियतमा के साथ एकात्मता भाव को चाहने वाले, शुष्क रोदन करने वाली तथा उदार हास्ययुक्त श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 10
सततसुरततृष्णाव्याकुलाबुन्मदिष्णू
विपुलपुलकराजद्गौरनीलोज्वलाङ्गौ।
मिथ उरुपरिरम्भादेकदेहायमानौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
निरन्तर सुरत रस तृष्णा में व्याकुल, उन्मत्त, विपुल पुलकावलि से शोभायमान गौर नील उज्वल शरीर वाले और परस्पर के निविड़ आलिंगन से मानो एक देह रूप, श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 11
सततमपरिमानोज्जृम्भमानानुरागौ
मदरसभरसिन्धू लोलदोलायिताङ्गौ।
दलितसक्लसेतू धन्यगोप्येकरम्यौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
जिनके निरन्तर उच्छलित असीम अनुराग गर्व रसाधिक्य के सागर के समान, चंचल दोलायमान अङ्ग हैं और जिनके नाश हो रहा है धैर्य्य दैन्यादिक भाव समूह अथवा लोकवेद से अतीत, सुकृत स्वरूपा गोपियों से मनोहर श्री राधिका कृष्ण चन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 12
विलुलितवरबेणी - हारमालावतंसौ
मृदुलमधुरहासोल्लासिवक्त्रेन्दुविम्बौ।
अतिरस मदलोलौ चित्रकन्दर्पकेली
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिकाकृष्णचन्द्रौ॥
जिनकी श्रेष्ठ वेणियाँ, हार, माल्य, भूषणादिक विदलायमान हो गये हैं और मन्द मधुर हास्य से जिनका मुख चन्द्रविम्ब उल्लसित है तथा जिनकी अतिशय सुरत गर्व से चपल, विस्मापनी कन्दर्पसम्बन्धिनी क्रीडा है ऐसे श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 13
सुरतरसमदान्धौ सन्ततं सन्तरन्तौ
त्रुटित वलय काञ्ची दाम हारावलिकौ।
मणिकनक विभूषोत्सारभास्वत्पराङ्गौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
सुरतरस के गर्व सागर में निरन्तर तहरने वाले, जिनके वलय, किंकिणी, पुष्पों की मालायें हार समूह टूट गये हैं, मणि कनक भूषणादिक अस्त व्यस्त हो जाने से जिनके उत्तम अंग प्रत्यंग शोभायमान हो रहे हैं, ऐसे श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्च में स्मरण कर।
श्लोक 14
स्तवकित मणिदाम्ना प्रेयसागुम्फितात्य-
द्भुत सुललितवेणी प्रेयसीक्लृप्तचूडौ।
मिथ उदयदखण्ड प्रेम रज्जू विबद्धौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
गुच्छायमान तथा प्रिय के द्वारा ग्रंथित (गूंथी हुई) मणिमाला से जिनकी वेणी सुललित हो रही है, और श्रीप्रिया के द्वारा जिनकी चूडा रची गयी है, परस्पर के उदय प्राप्त अखण्ड प्रेम रज्जु से परस्पर विशेषरूप से बन्ध जाने वाले, ऐसे श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 15
जघनलुलितवेणी विस्फुरत्वर्हचूडौ
कनक रुचिरचूडा कंकणद्वन्द्वपाणी।
विलसदरुणरोचिः पतिकौशेयवासौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
जंघों में चञ्चल मनोहर वेणी वाली तथा शोभायमान मयूरपंख की चुडा वाले, सुवर्ण निम्मित रुचिर चूडा तथा दोनों हस्त में कंकण धारण करने वाले, शोभायमान अरुण कान्ति तथा पीत कौशेय वस्त्र धारण कारी श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 16
कनकजलदगात्रौ नीलशोणाब्जनेत्रौ
मृगमदरसभालौ मालती कुन्दमालौ।
तरलतरुणवेशौ नीलपीताम्बरेशौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
जो सुवर्ण तथा जलद शरीर वाले हैं और जिनके नील तथा रक्त कमल की तरह नेत्र हैं और जो कपोल देश में मृगमद रस तथा गले में मालती, कुन्द माला धारण करते हैं, जिनका नवीन वेश है, नीलाम्बर तथा पीताम्बर धारी उन श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 17
ललितनवकिशोरौ नव्यलावण्यपुञ्जौ
सकलरसिक चूडालंकृती मुग्धबेशौ।
मधुरमधुर मूर्ती विद्युदम्भोदकान्ती
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
अभिनव ललित किशोर वय वाले, नवीन लावण्य की राशि, रसिक समुदाय के शिरोभूषण के अलंकार स्वरूप अर्थात परम रसिक शेखर, सुन्दर वेषधारी, अत्यन्त मधुर मूर्ति वाले, विद्युत् तथा मेघ की कान्ति की तरह कान्तियुक्त अर्थात् कान्त्यामृत तथा रसिकतामृतों की वर्षण से निजापेक्षित भक्त शस्यों के जीवनरूप श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 18
किमपि परमशोभामाधुरीरूपचेष्टा
हसित ललित दृष्टपात्यद्भूतोत्कर्षकाष्ठाम्।
परमरसरहस्यावेशतः सन्दधानौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
परम रस रहस्य में आवेश के कारण जो अत्यन्त शोभा, माधुर्य्य, सौन्दर्य्य, चेष्टा, हास्य, रसमयी भर्त्सना, परिहास, कोपसूचक दृष्टि इत्यादि के द्वारा अद्भुतता की चरम सीमा को धारण करने वाले हैं, उन श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 19
निखिलनिगमगूढ़ौ नित्यमन्यान्यगाढ़
प्रणयभरविवृद्धौ तुङ्गितानङ्ग चेष्टौ
सुरतरसमदान्वौ न्यस्तजीवौ मिथोऽङ्गे।
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
अत्यन्त प्रेम विषय के कारण निखिल निगम करके गुप्त रूप, नित्य परस्पर निविड प्रीति के आधिक्य वश वृद्धि प्राप्त अर्थात् पुष्ट है, और जो प्राकृत अनंगचेष्टा में शोभायमान, सुरतरस मदान्ध, परस्पर एक दूसरे के लिये जीवन समर्पण करने वाले हैं उन श्रीराधिकाकृष्णचंद्रको निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 20
रमणवदनचन्द्रे दत्तताम्बुलवीटी
निजरसनिधिवक्त्रे दत्ततच्चर्व्यभागौ।
मिथ उरुरसदाङ्ग स्पर्शलोलुभ्यमानौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
परस्पर-परस्पर के रमणीय वदनचन्द्र में ताम्बूल का वीड़ा अर्पण करने वाले तथा प्रियतम के द्वारा उसका चर्व्वणांश प्रियतमा के मुख में प्रदान करने में व्यग्र और परस्पर अत्यन्त रसद अंग प्रत्यंगों को स्पर्श करने में लोलुप श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृतनिकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 21
अति रसमदवेगान्निस्त्रपाधैर्य्यदृष्टी
क्रम समुदित तत्तत् सौरताश्चर्य्यनिती।
वहिरतिरसलीलानुव्रताज्ञामवर्ण्णौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
अत्यन्त रस मत्तता के वेग से जिनकी लज्जा रहित तथा धैर्य्य शून्य दृष्टि है और जिनकी क्रम से सुरतचर्य्या की आश्चर्य्यनीति उदय हो रही है और जिनके लीलागृह के बाहर अत्यन्त रसमयी उनकी लीला के पात्र रूप सखी मन्जरी गण विराजमान होकर उन लीला का वर्णन करते हुए आस्वादन कर रहे हैं, उन श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 22
रजत भवन रन्ध्रायातसन्मन्दशीता
निलविदलिततुङ्गानङ्गसंग्रामखेदौ।
क्षणसहचररम्यारव्धभूयो विहारौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
मणिमय भवन के गवाक्ष रन्ध्रों में जाने आने वाले सुगन्ध मन्द शीतल पवनों से जिनके अनंग संग्राम के श्रम लुप्त हो रहा है और जो उत्सव परायण सहचरी गणोंके द्वारा उत्सुक हो पुनर्वार विहार सुख आरम्भ कर रहे हैं उन श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।
श्लोक 23
तदति ललित लीला लोल लोलाङ्ग लक्ष्यौ
सुललित ललितादे र्निर्णिमेषाक्षिरन्ध्रैः।
हृदयमुपनयन्तौ पूर्ण सौख्याम्बुराशी
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
मधुररस परिकरों की मनोहारिणी अति सुन्दर सुरतलीला में जिनके कटि, नितम्ब, बाहु, मुखादिक सकल अंग चंचलायमान होने के कारण मानों लक्ष संख्या हो रहे हैं और जो सुललित ललितादि सखियों के निमेष रहित नयन द्वारों से हृदय देश में प्राप्त हो रहे हैं तथा जो पूर्ण सौख्य के सागर रूप हैं, ऐसे श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 24
प्रणयमयवयस्याः कुञ्जरन्ध्रार्पिताक्षी:
क्षितितलमनुलब्ध्वानन्दमूर्च्छा पतन्तीः।
प्रतिरतिविदधानौ चेष्टितैश्चित्रचित्रैः
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
रति के पद-पद में विचित्र से विचित्र चेष्टाओं के द्वारा निकुंज गवाक्ष जाल के छिद्रों में नयन अर्पण करने वाली अथच पृथ्वी में आनन्द मूर्छा को प्राप्त होने वाली प्रेममयी सखियों को हृदय में धारण करने वाले, श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 25
बहुविधपरिमृष्टान्योन्यगात्रावजस्त्र
बहुविध परिपृच्छा कारितान्यान्यवाचौ।
अनिमिषनयनालि स्वादितान्यान्यवक्त्रौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
निरन्तर पारस्परिक हस्त कमल के द्वारा अंग समूह मार्जन करने वाले तथा अनेक प्रकार की जिज्ञासाओं के द्वारा अनेक प्रकार की वचन रचना सृष्टि करने वाले, निमेष रहित नयन रूप सखियों के द्वारा पारस्परिक मुख कमल आस्वादनकारी श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 26
मनसिजरससिन्धोरद्भुतावर्त्तवेग
भ्रमिततनुमनस्कौ केलिविस्मापिताली।
बहुविधरसगात्रस्पर्शजल्पप्रहासौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
जिनके शरीर और मन कन्दर्परस - सागर के अद्भुत आवर्त्तन ( घूर्णन ) के वेग से चलायमान हैं और जो क्रीड़ा समूह से सखीवृन्दों को विस्मय करने वाले हैं तथा जो परस्पर अनेक प्रकार के रसमय शरीर का स्पर्श और हास्य वचन युक्त हैं उन श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 27
वहुलसुरतखेलायाससंखिन्नगात्रौ
दयितनिजसखिभि र्वीज्यमानौ पटान्तैः।
सरसभुजगवल्ली पल्लवास्वादिवक्त्रौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
जिनके शरीर अनेक प्रकार की सुरतक्रीड़ा के परिश्रम से खेद प्राप्त हो रहा है तथा जो निज प्रिय सखियों के द्वारा पटाञ्चल से वीज्यमान हैं और जिनके मुख कमल सरस ताम्बूल पल्लव के आस्वादन से शोभायमान है, ऐसे श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 28
मिथ उरुपुलकश्री दोर्ल्लताबद्धकण्ठौ
व्यतिमिलितमुखेन्दू किंकणी लालितांघ्री।
नवरतिरसखेला श्रान्तितन्द्रालुनेत्रौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
विपुल पुलकावलि से परस्पर शोभायमान, जिनके गल-देश परस्पर की भुजलताओं से वेष्टित है और परस्पर के मुख कमल में परस्पर मुख मिलाने वाले, तथा जिनके चरण कमल किंकिणी से शोभायमान है और जो नवीन रतिरस क्रीड़ा से श्रान्ति प्राप्त हैं अर्थात् जिनके नेत्र कमल निद्रारस से व्याकुल हैं ऐसे श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 29
सुरतरससमुद्रे पादमाचूडमग्नौ
त्रुटिलवमिव यातां मन्यमानौ त्रियामाम्।
प्रतिनिमिषमसीमोजृम्भितानङ्गतृष्णौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
सुरत रस सागर में आपाद मस्तक (चरण से लेकर मस्तक पर्यन्त) मग्न शील, त्रुटि लव काल को भी एक रात्रि मानने वाले, तथा जिनके निमेष-निमेष में असीम अनंग तृष्णा उठती है ऐसे श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 30
तदतिमधुरधाम्नि नाम्नि वात्सल्यमात्रात्
कथमपि कलनीयौ कस्यचिद्भाग्यसीम्नः।
श्रूतिततिभिरगम्यौ सत्सभाजस्रसङ्गौ
स्मर निभृतनिकुञ्जे राधिका कृष्णचन्द्रौ॥
नाम धाम के वात्सल्य मात्र अर्थात् अति अल्पमात्र यत् किंचित् नाम धाम के अनुशीलन से सीमा प्राप्त सौभाग्य क्षेत्र शील किसी व्यक्ति का हेला व श्रद्धा से भी ग्रहण रूप, वेद समूह से अगम्य, निखिल सज्जनों द्वारा वन्दनीय, केवल सखी मञ्जरियों की सभा में संप्राप्त श्रीराधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुंज में स्मरण कर।
श्लोक 31
परमरसग्हस्य नन्दनिस्यन्दिवृन्दा
वनविपिननिकुञ्जे दिव्यदिव्यै र्विलासैः।
निरवधिरसमानौ राधिका कृष्णचन्द्रौ
भज सकलमुपेक्ष्य तावकी शास्त्रयुक्ती॥
रे मन ! देह, गेह, शास्त्रयुक्ति, प्रभृति का पूर्णतः उपेक्षा करके परमरस रहस्य आनन्द के सागर रूप वृन्दावन के निकुंज में दिव्यातिदिव्य विलासों से निरन्तर शोभायमान श्रीराधिका कृष्णचन्द्र का भजन कर।
श्लोक 32
स्तवमिममतिरम्यं राधिकाकृष्णचन्द्र
प्रमदभरविलासैरद्भूतं भावयुक्तः।
पठति य इह रात्रौ नित्यमव्यग्रचित्तः
विमलमतिसु राधालीसु सख्यं लभेत॥
जो भावयुक्त होकर रात्रिकाल में स्थिरचित्त से राधिका कृष्ण चंद्र के प्रमोद भरे विलासों से अद्भुत मनोहर इस स्तव का पाठ करे वह विमल मतिवाली राधिका की सखियों में सख्य रूप को प्राप्त होता है अर्थात् सखी रूप होकर युगल सरकार की सेवा को प्राप्त करता है।
इति श्रीमद् रूप गोस्वामिना विरचितः
श्रीनिकुञ्जरहस्यस्तवः समाप्तः

