(राग कानहारौं )
प्यारी तेरी महिमा वरनी न जाय
जिहिं आलस काम बस कीन। [1]
ताकौ दंड हमैं लागत है री भए आधीन। [2]
साढे ग्यारह ज्यौं औंटि दूजे नव सत साजि सहज ही
तामैं जवादि कर्पूर कस्तूरी कुमकुम के रंग भीन। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी रस बस करि लीन॥ [4]
- स्वामी श्री हरिदास, केलिमाल (26)
प्रियतम कह रहे हैं— हे प्यारी जू, आपकी महिमा का वर्णन मैं कैसे करूँ? मुझे कामरूप प्रेम ने वश में कर रखा है, और आप अति सुकुमारी हैं; आलसवश केलि को भी मानो बिसरा दिया है। [1]
आपके लिए मैं चाह-रूपी काम में भींज रहा हूँ; उसका दण्ड भी मुझे ही भरना पड़ रहा है, क्योंकि मैं कामना के अधीन हूँ। [2]
आपने स्वर्ण-समान तन पर सोलह श्रृंगार धारण कर रखे हैं। मेरा वर्ण तो श्याम है, और आपका महाकंचनमय तन कुमकुम, कपूर, कस्तूरी और जावदि की सुगन्ध-रंग से भीगा हुआ अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। [3]
श्री हरिदास जी की स्वामिनी श्री राधे जी ने श्याम कुञ्जबिहारी को रस-वश में लीन कर रखा है। [4]

