किवं वैकुण्ठ लक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र में नास्ति राधा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, राधा सुधा निधि- 216

किवं वैकुण्ठ लक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र में नास्ति राधा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, राधा सुधा निधि- 216

“ किवं वैकुण्ठ लक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र में नास्ति राधा || ”
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, राधा सुधा निधि- 216

"वैकुण्ठ" निवास के साथ हमारा क्या प्रयोजन एवं उद्देश्य है जहां महालक्ष्मी रहती है लेकिन श्री राधा नहीं?